01जल पर नारायण
भगवान पीठ के बल लेटे हैं, पाँव एक-दूसरे पर रखे, चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल, और मुकुट के पीछे शेषनाग के ग्यारह फन उठे हैं। चारों ओर का कुण्ड क्षीरसागर है। पुजारी हर सुबह प्रतिमा पर चढ़कर स्नान और शृंगार कराते हैं, और भक्त कुण्ड के किनारे घूमकर मुख के दर्शन करते हैं। घाटी की परम्परा कहती है कि कुण्ड का जल गोसाईंकुण्ड से आता है, वह सरोवर जिसे महादेव ने हालाहल पीने के बाद त्रिशूल से बनाया। इसीलिए प्रतिमा का नाम शिव का है, नीलकण्ठ, जबकि यहाँ विष्णु लेटे हैं।
02जिसे राजा नहीं देखता
घाटी की एक परम्परा नेपाल के राजाओं को बुढानीलकण्ठ के दर्शन से रोकती थी। कहते हैं कि 17वीं शताब्दी में राजा प्रताप मल्ल ने स्वप्न देखा कि जो राजा इस प्रतिमा को देखेगा उसकी मृत्यु होगी, और मल्लों के बाद शाह राजाओं ने भी यह नियम निभाया। राजाओं के लिए बालाजू के राजउद्यान में शयन नारायण की एक छोटी प्रतिमा बनाई गई, ताकि वे नियम तोड़े बिना पूजा कर सकें। यहाँ का सबसे बड़ा दिन कार्तिक की हरिबोधिनी एकादशी है, जब नारायण चार मास की निद्रा से जागते हैं और हज़ारों लोग भोर से पहले पहुँचते हैं।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- लगभग 7वीं शताब्दीलिच्छवि काल में शयन नारायण की प्रतिमा गढ़ी जाती है।
- 1641–1674प्रताप मल्ल का शासन, जिनसे राजाओं के दर्शन-निषेध का नियम जोड़ा जाता है।
मध्य काठमाण्डू से लगभग 10 किमी उत्तर, शिवपुरी की तलहटी में। भीतरी घेरे में केवल हिन्दू जा सकते हैं; अन्य लोग रेलिंग से दर्शन करते हैं।




