संत रविदास (रैदास)

संत रविदास (रैदास)

15वीं–16वीं शताब्दी ई. · सीर गोवर्धनपुर, काशी (वाराणसी) · सधुक्कड़ी (संत भाषा), ब्रज और अवधी के निकट

गुरु रविदास

संत रविदास काशी के चर्मकार थे, जो सड़क किनारे जूते गाँठते और अपनी कमाई और समय साधुओं को देते थे। उनके अनुयायी वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर में माघ पूर्णिमा को उनका जन्मोत्सव मनाते हैं। परंपरा उन्हें कबीर, सेन और पीपा के साथ स्वामी रामानंद के शिष्यों में गिनती है, और भक्त-चरित्र उनकी अनेक कथाएँ कहते हैं: चमड़ा भिगोने की कठौती में प्रकट हुई गंगा, जिससे कहावत बनी “मन चंगा तो कठौती में गंगा”; और राजकुमारी मीरा, जो उनसे मार्गदर्शन लेने आईं। उनके चालीस शबद गुरु ग्रंथ साहिब में सुरक्षित हैं, और बहुत से पद और साखियाँ उत्तर भारत के संकलनों में मिलते हैं। वे जन्म के कारण मिले तिरस्कार की बात खुलकर कहते हैं और उसका उत्तर क्रोध से नहीं, भगवान से देते हैं: वह प्रभु जो तिरस्कृत के सिर पर राजछत्र रख देता है। उनका “बेगमपुरा”, बिना दुख का ऐसा नगर जहाँ कोई दोयम दर्जे का नहीं, आज भी गाया जाता है। उन्होंने निर्गुण राम और हरि को गाया, और उनका सबसे प्रिय पद, “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी”, हिंदी में भक्ति का सबसे सरल कथन है। पंजाब, उत्तर प्रदेश और उससे आगे के समुदाय उन्हें अपना गुरु मानकर पूजते हैं।

रचनाएँ

  • गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित शबद
  • रैदास जी की बानी (पद और साखी)