चित्र: Master of the first generation after Manaku and Nainsukh of · Public domain
संत

गुरु रविदास

काशी के संत-कवि, बेगमपुरा के गायक

15वीं–16वीं शताब्दी ई.

काशी के पास सीर गोवर्धनपुर के चर्मकार रविदास ने ऐसे नगर का गीत गाया जहाँ कोई दुख नहीं, कोई ऊँचा-नीचा नहीं। उनके चालीस शबद गुरु ग्रंथ साहिब में हैं, और माघ पूर्णिमा को उनकी जयंती पर लाखों लोग वाराणसी आते हैं।

“बेगमपुरा सहर को नाउ। दूखु अंदोहु नही तिहि ठाउ॥”Guru Granth Sahib, Raag Gauri, Ang 345 (Bhagat Ravidas)

01कठौती में गंगा

वे जीवन भर जूते गाँठते रहे और साधुओं को खुले हाथ देते रहे। परम्परा उन्हें कबीर की तरह स्वामी रामानन्द का शिष्य मानती है। हिंदी प्रदेश का हर व्यक्ति जानता है ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’; यह उनकी एक कथा से आया है: गंगा स्नान को जाते एक ब्राह्मण ने उनकी भेंट ले जाने की बात कही, और कहते हैं माँ गंगा ने स्वयं जल से हाथ निकालकर भेंट ली। मीराबाई ने, और परम्परा के अनुसार चित्तौड़ की रानी झाली ने भी, उन्हें गुरु माना।

02बेगमपुरा

1604 में गुरु अर्जन ने आदि ग्रंथ संकलित किया तो उसमें रविदास के चालीस शबद और एक सलोक रखे। सबसे प्रसिद्ध है बेगमपुरा, बिना ग़म का नगर, जहाँ न कर है न भय, न दूसरा दर्जा न तीसरा, और सब जहाँ चाहें विचरते हैं। उनके अनुयायी, रविदासिया, और हर पृष्ठभूमि के भक्त माघ पूर्णिमा को सीर गोवर्धनपुर के गुरु रविदास जन्मस्थान मंदिर में जुटते हैं।

काशी विश्वनाथ
स्थान · वर्तमान मन्दिर 1780, अहिल्याबाई होलकर; शिखरों पर सोना 1835, महाराजा रणजीत सिंहकाशी विश्वनाथकाशी का ज्योतिर्लिंग; वह नगरी जिसे शिव कभी नहीं छोड़ते और जहाँ घाट पर देह छूटने को मोक्ष कहा गया है। मन्दिर 1194 और 1669 में तोड़ा गया, और आज अपने पुराने चबूतरे पर बनी मस्जिद के बगल में खड़ा है।पढ़ें →

“बेगमपुरा सहर को नाउ। दूखु अंदोहु नही तिहि ठाउ॥”

Guru Granth Sahib, Raag Gauri, Ang 345 (Bhagat Ravidas)