मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में॥
जो सुख पाऊँ राम भजन में
सो सुख नाहिं अमीरी में॥
भला बुरा सब का सुन लीजै
कर गुजरान गरीबी में॥
आखिर यह तन छार मिलेगा
कहाँ फिरत मग़रूरी में॥
प्रेम नगर में रहनी हमारी
साहिब मिले सबूरी में॥
कहत कबीर सुनो भई साधो
साहिब मिले सबूरी में॥
Man lagyo mero yar fakiri mein.
Jo sukh paun Ram bhajan mein,
so sukh nahin amiri mein.
Bhala bura sab ka sun lijai,
kar gujran garibi mein.
Akhir yah tan chhar milega,
kahan phirat magruri mein.
Prem nagar mein rahni hamari,
Sahib mile saburi mein.
Kahat Kabir suno bhai sadho,
Sahib mile saburi mein.
अर्थ
मेरे मित्र, मेरा मन फ़कीरी में लग गया है।
जो सुख राम-भजन में पाता हूँ, वह सुख अमीरी में नहीं।
सबकी भली-बुरी बात सुन लो और गरीबी में गुज़ारा कर लो।
आख़िर यह शरीर राख में मिल जाएगा; घमंड में कहाँ भटक रहे हो?
हमारा रहना प्रेम-नगर में है; स्वामी धीरज से मिलते हैं।
कबीर कहते हैं, हे साधुओ सुनो: स्वामी धीरज से मिलते हैं।
इस भजन के बारे में
फ़कीरी, मग़रूरी और सबूरी जैसे शब्द पंद्रहवीं शताब्दी की काशी की मिली-जुली बोली दिखाते हैं, जहाँ कबीर के गीत साधुओं और आम लोगों के बीच समान रूप से चलते थे। यह भजन गरीब की स्वतंत्रता का गुणगान करता है: सबकी सुनो, कम चाहो, शरीर का अंत याद रखो, और धीरज से प्रभु की राह देखो। मालवा की कबीर मंडलियों और उत्तर भारत के सत्संगों में यह खूब गाया जाता है; कविता कोश का पाठ अंतिम पंक्ति को टेक के रूप में दोहराता है।
Kabir, bhajan; text as on Kavita Kosh
