गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय॥

दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, दुख काहे को होय॥

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर॥

साँई इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥

ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय॥

कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढे बन माहिं।
ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखे नाहिं॥

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो मन खोजा आपना, मुझ-सा बुरा न कोय॥

निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥

काल्ह करै सो आज कर, आज करै सो अब्ब।
पल में परलय होयगी, बहुरि करैगो कब्ब॥

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होय॥

अर्थ

गुरु और गोविंद दोनों सामने खड़े हैं, पहले किसके पाँव छुऊँ? मैं अपने गुरु पर बलिहारी जाता हूँ, जिन्होंने गोविंद का पता बताया।

दुख में सब भगवान को याद करते हैं, सुख में कोई नहीं करता। जो सुख में भी याद करे, उसे दुख क्यों हो?

माला फेरते-फेरते युग बीत गया, पर मन का फेर नहीं मिटा। हाथ की माला छोड़ दो और मन के मनके फेरो।

हे स्वामी, इतना दीजिए जिसमें परिवार का निर्वाह हो जाए; मैं भी भूखा न रहूँ और कोई साधु भी मेरे द्वार से भूखा न जाए।

साधु की जाति मत पूछो, उसका ज्ञान पूछ लो। मोल तलवार का करो, म्यान को पड़ी रहने दो।

हे मन, धीरे-धीरे सब कुछ होता है। माली सौ घड़े पानी सींचे, फल तो ऋतु आने पर ही लगता है।

ऐसी वाणी बोलो जिसमें मन का अहंकार न हो; वह दूसरों को भी शीतल करे और तुम्हें भी।

कस्तूरी हिरन की अपनी नाभि में है, पर वह उसे वन में ढूँढता फिरता है। इसी तरह राम हर हृदय में हैं, पर संसार देखता नहीं।

मैं बुरा आदमी ढूँढने निकला तो कोई बुरा नहीं मिला। जब अपना मन खोजा, तो मुझसे बुरा कोई नहीं था।

निंदा करने वाले को पास रखो, आँगन में उसके लिए कुटिया बना दो। वह बिना पानी और साबुन के स्वभाव को निर्मल कर देता है।

जो कल करना है वह आज करो, जो आज करना है वह अभी। पल भर में प्रलय हो जाएगी, फिर कब करोगे?

पोथियाँ पढ़-पढ़कर संसार मर गया, पर कोई पंडित नहीं बना। जो प्रेम के ढाई अक्षर पढ़ ले, वही पंडित है।

इस भजन के बारे में

कबीर की साखियाँ दो पंक्तियों की कहावतें हैं, जो आसानी से याद रहती हैं, और ये बारह वे हैं जिन्हें अधिकांश भारतीय जानते हैं, बिना यह जाने कि कहाँ सीखीं: दादी से, स्कूल की दीवार से, ट्रक के पीछे लिखी पंक्ति से। पहला दोहा हर जगह गुरु पूर्णिमा पर बोला जाता है। हर दोहा एक ही काम करता है: किसी आदत को पकड़ता है (केवल संकट में प्रार्थना, मन भटकते हुए माला फेरना, साधु को जन्म से परखना) और उसे उलट देता है। अलग-अलग संकलनों में कुछ शब्दों के पाठ बदलते हैं; पाठ कविता कोश के अनुसार है।

Kabir, sakhis (Kabir Dohavali); text as on Kavita Kosh