घूँघट का पट खोल रे, तोको पीव मिलेंगे।
घट-घट में वह साँई रमता, कटुक वचन मत बोल रे॥

धन जोबन का गरब न कीजै, झूठा पचरंग चोल रे।
सुन्न महल में दियना बारि ले, आसन सों मत डोल रे॥

जागू जुगुत सों रंगमहल में, पिय पायो अनमोल रे।
कह कबीर आनंद भयो है, बाजत अनहद ढोल रे॥

अर्थ

अपने घूँघट का पट खोल, तुझे प्रियतम मिलेंगे। वह स्वामी हर हृदय में रमता है, इसलिए कड़वे वचन मत बोल।

धन और जवानी का घमंड मत कर; पाँच रंगों का यह शरीर रूपी चोला झूठा है। शून्य के महल में दीया जला ले और अपने आसन से मत डिग।

सही युक्ति से जागकर रंगमहल में मैंने अनमोल प्रियतम को पा लिया। कबीर कहते हैं: आनंद हो गया है, अनहद का ढोल बज रहा है।

इस भजन के बारे में

कबीर प्रायः स्वयं को दुलहन और भगवान को दूल्हा मानकर बोलते हैं। घूँघट अज्ञान और अभिमान है; उसे हटाओ तो प्रियतम पहले से वहीं हैं। रहस्य की बातों के बीच एक पंक्ति सीधी नैतिक सीख देती है: जब प्रभु हर हृदय में हैं, तो किसी से कहा गया कटु वचन उन्हीं से कहा गया है। बाकी पद योगियों की भाषा लेता है, भीतर की निश्चलता का सुन्न महल और ध्यान में सुनाई देने वाला अनहद नाद।

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