01उदगीर का युद्ध
1759–60 की सर्दियों में निज़ाम के भाई सलाबत जंग, निज़ाम अली के साथ, मराठों के विरुद्ध बढ़े। पेशवा बालाजी बाजीराव ने अपने चचेरे भाई सदाशिवराव भाऊ को विश्वासराव और इब्राहीम ख़ान गार्दी के प्रशिक्षित तोपचियों के साथ भेजा। फ़रवरी 1760 के आरम्भ में उदगीर के पास सेनाएँ भिड़ीं, और निज़ाम की सेना घिरकर हारी। उसके बाद की संधि से मराठों को लगभग साठ लाख रुपये वार्षिक आय का प्रदेश मिला, जिसमें दक्कन के बड़े दुर्ग अहमदनगर और दौलताबाद भी थे। भाऊ की प्रतिष्ठा इतनी बढ़ी कि अगले ही महीने पेशवा ने उन्हें अहमद शाह अब्दाली का सामना करने उत्तर भेजा, और वे पानीपत पहुँचे।
02दुर्ग
उदगीर दुर्ग मराठवाड़ा के पठार पर है, चट्टान में कटी गहरी खाई से घिरा, और दीवारों के भीतर ज़मीन के नीचे बने महल और कुएँ हैं। यह बहमनी सुल्तानों और फिर अहमदनगर के निज़ामशाहों का था। अक्टूबर 1636 में शाहजहाँ के दक्कन अभियान में इसने मुग़ल सेनापति ख़ान दौरान के सामने हथियार डाले, जो दृश्य शाही पादशाहनामा में चित्रित है। 1760 के बाद कुछ समय मराठों के पास रहा, और बाद में हैदराबाद को लौटा।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- अक्टूबर 1636दुर्ग ने मुग़ल सेनापति ख़ान दौरान के सामने हथियार डाले।
- फ़रवरी 1760सदाशिवराव भाऊ ने उदगीर के पास निज़ाम की सेना को हराया।





