01व्यास की तीन मुट्ठियाँ
मन्दिर की कथा कहती है कि कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद महर्षि व्यास तप के लिए शान्त स्थान खोजते हुए यहाँ गोदावरी तट पर आए। हर दिन स्नान के बाद वे तीन मुट्ठी बालू लाते और उनसे सरस्वती, लक्ष्मी और काली का रूप बनाते। स्थान व्यासपुरी कहलाया, फिर वासर, और अब बासर। सरस्वती की मूर्ति पर हल्दी लगी रहती है, और भक्त विद्या की प्रार्थना करते हुए उसमें से थोड़ा प्रसाद के रूप में खाते हैं। मन्दिर के पास व्यास गुफा है।
02पहले अक्षर
अक्षराभ्यासम, बच्चे का पहली बार अक्षर लिखना, अधिकांश परिवारों के आने का कारण है। बच्चा देवी के सामने माता-पिता की गोद में बैठता है और पुजारी उसकी छोटी उँगली पकड़कर चावल में या स्लेट पर अक्षर लिखवाते हैं। वसन्त पंचमी और शारदीय नवरात्र में कतारें नदी तक पहुँच जाती हैं। मन्दिर हैदराबाद से लगभग 200 किमी उत्तर, महाराष्ट्र सीमा के पास है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 20वीं शताब्दीराज्य धर्मस्व विभाग के अधीन मन्दिर का पुनर्निर्माण और विस्तार होता है।
सिकन्दराबाद–नान्देड़ रेल मार्ग पर बासर का स्टेशन है, मन्दिर के पास।




