012005 का कब्रिस्तान
खेत समतल करते किसानों को मृद्भाण्ड और हड्डियाँ मिलीं, और 2005–06 में डी. वी. शर्मा के नेतृत्व में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण ने 116 समाधियों की खुदाई की। कई में मटके, मनके और ताँबे की शृंगिका-मूठ वाली तलवारें थीं, उस प्रकार की जो गंगा–यमुना दोआब के ताम्र-निधियों से जानी जाती हैं। मृद्भाण्ड सिन्धु–सरस्वती संसार के उत्तर चरण के गेरुए रंग के हैं। कुछ शवों के सिर के पास मटका और भोजन का अर्पण रखा गया था, और कुछ समाधियाँ प्रतीकात्मक थीं, जिनमें सामग्री थी पर शव नहीं, जो मृतकों के लिए सावधानी से किए गए संस्कारों की ओर संकेत करता है।
022018 के रथ
2018 में भा.पु.स. एस. के. मंजुल के नेतृत्व में लौटा और तीन अलग प्रकार के समाधि-कक्ष खोले। पायों वाले ताबूत ताँबे की चादर से ढके और सज्जित थे। उनके पास ठोस पहियों वाले तीन रथ थे, जिनकी लकड़ी गल चुकी थी पर मिट्टी में आकार बचा था और जिन पर ताँबे का आवरण था, साथ में तलवारें, कटारें, ढालें, ताँबे का शिरस्त्राण और दर्पण। मंजुल ने इन्हें घोड़ों या बैलों से खींचे जाने वाले युद्ध-रथ माना; कुछ विद्वान खींचने वाले पशु के निश्चित होने तक इन्हें गाड़ी कहना पसन्द करते हैं। लगभग 2000–1800 ई.पू. के ये भारत में मिले सबसे पुराने पहियेदार वाहन हैं, और दिखाते हैं कि दोआब में योद्धा-वर्ग उस तिथि से बहुत पहले था जो औपनिवेशिक युग का आक्रमण-सिद्धान्त बाहर से रथों के आने की बताता था।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 2005–06डी. वी. शर्मा के नेतृत्व में भा.पु.स. 116 समाधियों की खुदाई करता है।
- 2018 ई.एस. के. मंजुल के नेतृत्व में भा.पु.स. को तीन रथ और राजसी समाधियाँ मिलीं।
सिनौली गाँव, बागपत ज़िला, दिल्ली से लगभग 70 किमी उत्तर; खुदाई की खाइयाँ भर दी गई हैं, और अवशेष भा.पु.स. के पास हैं।





