आज भी खड़ा

पऴमुदिर्चोलै मुरुगन मन्दिर, सोलैमलै

मुरुगन का छठा धाम, मदुरै के ऊपर अऴगर पहाड़ियों के वन में। तमिल परम्परा कहती है कि यहीं बालक मुरुगन ने कवयित्री अव्वैयार की फल के एक प्रश्न से परीक्षा ली।

निर्माण: संगम काव्य में वर्णित धाम, जहाँ पहले केवल वेल की पूजा होती थी; वर्तमान मन्दिर आधुनिकस्थान: तमिलनाडु (मदुरै ज़िला, अऴगर कोविल के ऊपर)देवता: भगवान मुरुगन, वल्ली और देवयानी सहित10.09° N, 78.22° E
चित्र: Baskaran V · CC BY-SA 3.0

01सुट्ट पऴम् या सुडाद पऴम्

वृद्ध और थकी हुई अव्वैयार इस पहाड़ी पर एक नावल (जामुन) के पेड़ के नीचे बैठीं। डाल पर बैठे एक ग्वाले बालक ने पूछा, भुने फल चाहिए या बिना भुने? प्रश्न पर हँसकर उन्होंने कहा, बिना भुने। उसने पेड़ हिलाया, फल धूल में गिरे, और वे हर फल को फूँककर साफ़ करने लगीं। बालक बोला, फूँकती क्यों हो, क्या गरम हैं? अव्वैयार समझ गईं कि एक बालक ने तमिलों की सबसे बड़ी कवयित्री को निरुत्तर कर दिया, और उन्होंने उसे मुरुगन के रूप में पहचाना। स्थान का नाम इन्हीं फलों से है: पऴम्, फल; उदिर्, झड़ना; चोलै, उपवन।

02वन में वेल

नक्कीरर की तिरुमुरुगाऱ्ऱुप्पडै मुरुगन के धामों का वर्णन पहाड़ी वनों पर पूरा करती है, और इलंगो अडिगल का शिलप्पदिकारम् सोलैमलै पहाड़ी के धाम का गान करता है। बहुत समय तक यहाँ केवल वेल की पूजा होती थी। बाद में गणेश के और वल्ली-देवयानी सहित मुरुगन के मन्दिर बने। मन्दिर नीचे के महान विष्णु मन्दिर अऴगर कोविल से लगभग 4 किलोमीटर ऊपर है, और उससे थोड़ा और ऊपर नूपुर गंगा का सोता है। सड़क पर बन्दरों का राज है।

दर्शन और यात्रा

पऴमुदिर्चोलै मदुरै से लगभग 25 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है। नीचे अऴगर कोविल में कळ्ळऴगर के दर्शन करें, फिर सड़क से ऊपर जाएँ; हो सके तो आगे नूपुर गंगा तक पैदल जाएँ।