01अऴगर वैगै में उतरते हैं
कल्लऴगर, कल्लर देश के सुन्दर स्वामी, मीनाक्षी के भाई माने जाते हैं, जो उन्हें सुन्दरेश्वर को सौंपने आते हैं। कथा कहती है कि वे देर से पहुँचते हैं, विवाह हो चुका होता है, और वे नदी-तट से लौट जाते हैं। हर वर्ष चित्तिरै (अप्रैल–मई) में उत्सव मूर्ति कल्लर सरदार के वेश में कई दिनों की शोभायात्रा में पहाड़ी से मदुरै लाई जाती है, और पूर्णिमा की सुबह सोने के घोड़े पर वैगै में उतरती है। 17वीं शताब्दी में मदुरै के नायक तिरुमलै नायक ने इस वैष्णव उत्सव को मीनाक्षी के शैव विवाह-उत्सव से जोड़ा, ताकि पूरा नगर एक ही पर्व मनाए।
02द्वार पर करुप्पसामी
मन्दिर के बड़े द्वार पदिनेट्टाम्पडि की रक्षा करुप्पसामी करते हैं, और कभी गाँवों के झगड़ों में उसके बन्द किवाड़ों के आगे ली गई शपथ अटल मानी जाती थी। पेरियाळ्वार, आण्डाळ, भूतत्ताळ्वार, पेयाळ्वार, नम्माळ्वार और तिरुमंगै आळ्वार ने इस दिव्य देशम को तिरुमालिरुंचोलै नाम से गाया। उसी पहाड़ी पर ऊपर नूपुर गंगै का सोता है, जिसके जल से ही भगवान का अभिषेक होता है, और उससे आगे मुरुगन के छह धामों में एक पऴमुदिर्चोलै है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- आळ्वार कालछह आळ्वार दिव्य प्रबन्धम में तिरुमालिरुंचोलै को गाते हैं।
- 17वीं शताब्दीतिरुमलै नायक अऴगर उत्सव को मदुरै के चित्तिरै उत्सव से जोड़ते हैं।
मदुरै से लगभग 21 किमी उत्तर-पूर्व; मदुरै पेरियार बस अड्डे से बसें चलती हैं। वैगै प्रवेश चित्तिरै पूर्णिमा को होता है।




