01तीन द्वारों से दर्शन
मूर्ति इतनी लंबी है कि एक साथ दिखती नहीं। गर्भगृह में आड़ी लेटी यह मूर्ति सिर से पाँव तक लगभग 18 फुट की है, और भक्त तीन द्वारों से क्रम से दर्शन करता है: पहले द्वार से मुख और भगवान के दाहिने हाथ के नीचे शिवलिंग, दूसरे से नाभि-कमल पर बैठे ब्रह्मा, तीसरे से चरण। यह मूर्ति एक पत्थर से नहीं गढ़ी गई। इसमें नेपाल की गण्डकी नदी से लाए गए 12,008 शालग्राम हैं, जिन्हें कटुशर्करा योगम नामक जड़ी-बूटी, गुड़ और राल के लेप से जोड़ा गया है। इसलिए अभिषेक मुख्य मूर्ति पर नहीं, केवल उत्सव मूर्ति पर होता है।
02अग्निकाण्ड और राज्य का दान
1686 में आग लगने से लकड़ी का पुराना मंदिर बहुत क्षतिग्रस्त हो गया। मार्तण्ड वर्मा ने, जिन्होंने 1729 से 1758 के बीच त्रावणकोर को एक सशक्त राज्य बनाया, इसे पत्थर से फिर खड़ा किया; 1730 के दशक में वर्तमान मूर्ति की प्रतिष्ठा हुई और उन्हीं वर्षों में पूर्व का विशाल गोपुरम उठा। जनवरी 1750 में उन्होंने ‘तृप्पडिदानम’ किया: अपनी राजकीय तलवार गर्भगृह की सीढ़ियों पर रखकर पूरा राज्य पद्मनाभ को अर्पित कर दिया। 2011 में सर्वोच्च न्यायालय ने मंदिर के तहखानों की सूची बनवाई, जिनमें सदियों से जमा सोना और रत्न थे। जुलाई 2020 में उसी न्यायालय ने मंदिर के प्रबंधन में त्रावणकोर राजपरिवार के अधिकार को बनाए रखा।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- आळ्वार कालनम्माळ्वार ने तिरुवाय्मोऴि में अनन्तपुरम के पद्मनाभ का गान किया।
- 1686आग से मंदिर क्षतिग्रस्त हुआ।
- 1730 का दशकमार्तण्ड वर्मा ने मंदिर को पत्थर से फिर बनवाया और मूर्ति की पुनः प्रतिष्ठा की।
- जनवरी 1750तृप्पडिदानम: त्रावणकोर राज्य पद्मनाभ को अर्पित हुआ।
- 2011सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर मंदिर के तहखानों की सूची बनी।
- जुलाई 2020सर्वोच्च न्यायालय ने मंदिर-प्रशासन में त्रावणकोर परिवार के अधिकार को बनाए रखा।
प्रवेश केवल हिंदुओं के लिए है। पुरुष मुण्डु पहनकर बिना कुर्ते के जाते हैं; महिलाएँ साड़ी या ब्लाउज़ के साथ मुण्डु पहनती हैं।






