01अवध का विलय
18वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में गोमती के पास एक ऊँचाई पर अवध दरबार में कंपनी के प्रतिनिधि के लिए रेज़िडेंसी बनी। फ़रवरी 1856 में डलहौज़ी ने अवध का विलय कर लिया और नवाब वाजिद अली शाह को कलकत्ता भेज दिया। इस विलय ने हर सिपाही के गाँव को छुआ, क्योंकि बंगाल सेना की बड़ी भर्ती अवध से होती थी। जब विद्रोह आया, तो वाजिद अली शाह की बेगमों में से एक, बेगम हज़रत महल ने अपने अल्पवय पुत्र बिरजिस क़द्र को शासक घोषित किया, और ताल्लुक़दार और सिपाही उनके चारों ओर जुटे।
02घेरा
30 जून 1857 को चिनहट में हार के बाद सर हेनरी लॉरेंस टुकड़ी, वफ़ादार सिपाहियों और बहुत-से नागरिकों के साथ रेज़िडेंसी में लौट आया। 2 जुलाई को वह एक गोले से घायल हुआ और 4 जुलाई को मर गया। 25 सितंबर को हैवलॉक और आउट्रम घेरा तोड़कर भीतर तो पहुँचे पर बाहर न निकल सके, और घेरा तब तक चला जब तक नवंबर में सर कॉलिन कैंपबेल की सेना परिसर तक पहुँचकर उसे ख़ाली न करा ले गई। लखनऊ नगर मार्च 1858 में कड़ी गली-लड़ाई के बाद ही वापस लिया जा सका। अंग्रेज़ों ने टूटे भवनों को स्मारक के रूप में रखा और अगस्त 1947 तक उन पर दिन-रात अपना झंडा फहराए रखा। अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इस स्थल और इसके संग्रहालय की देखरेख करता है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1780–1800रेज़िडेंसी के भवन बनते हैं।
- फ़रवरी 1856कंपनी अवध का विलय करती है।
- 30 जून 1857चिनहट के बाद रेज़िडेंसी का घेरा आरंभ होता है।
- नवंबर 1857कॉलिन कैंपबेल रेज़िडेंसी को छुड़ाकर ख़ाली कराता है।
- मार्च 1858अंग्रेज़ लखनऊ फिर ले लेते हैं।




