आज भी खड़ा

चौमुखा मन्दिर, राणकपुर

अरावली की वनाच्छादित घाटी में चार मुखों वाला जैन मन्दिर, मेवाड़ के राणा कुम्भा द्वारा दी गई भूमि पर सेठ धरणा शाह ने बनवाया। इसमें 1,444 नक़्क़ाशीदार स्तम्भ हैं, और परम्परा कहती है कि कोई दो एक जैसे नहीं।

निर्माण: 1437 में आरम्भ, 1439 ई. का शिलालेख; राणा कुम्भा के समय धरणा शाहस्थान: राजस्थान (पाली ज़िला)देवता: आदिनाथ (ऋषभनाथ), प्रथम जैन तीर्थंकर25.12° N, 73.47° E
  1. 1437 ई.
  2. 1439 ई.
चित्र: Brihaspati · CC BY 4.0

01पत्थर में एक स्वप्न

मेवाड़ के पोरवाल जैन मन्त्री धरणा शाह ने, कहा जाता है, स्वप्न में एक दिव्य विमान देखा और उसी आकार का मन्दिर चाहा। राणा कुम्भा ने भूमि दी और गाँव का नाम उन्हीं पर राणकपुर पड़ा। स्थपति थे देपाक। प्रवेश के पास एक स्तम्भ पर 1439 का शिलालेख दानदाता, राजा और सूत्रधार के नाम बताता है। योजना चौमुखी है: आदिनाथ की चतुर्मुख प्रतिमा चारों दिशाओं की ओर देखती है, इसलिए मन्दिर चारों ओर खुलता है, और 29 मण्डपों में स्तम्भों के बीच से धूप उतरती है।

02पूजा और संरक्षण

मेवाड़ के युद्ध पास से गुज़रे और मन्दिर लम्बे समय तक सूना भी पड़ा रहा, पर गिराया कभी नहीं गया। श्वेताम्बर जैनों की आनन्दजी कल्याणजी पेढ़ी ने 20वीं शताब्दी में इसका जीर्णोद्धार कराया और आज वही इसकी देखरेख करती है। पार्श्वनाथ मन्दिर और एक छोटा सूर्य मन्दिर पैदल दूरी पर हैं। मुख्य मन्दिर के भीतर पार्श्वनाथ की वह शिला देखिए जिसमें अनेक फनों वाला नाग उन्हें छाया देता है और उसकी कुण्डलियाँ चारों ओर गुँथी हैं, संगमरमर के एक ही खण्ड में तराशी।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 1437 ई.राणा कुम्भा के समय निर्माण आरम्भ।
  2. 1439 ई.स्तम्भ-लेख में धरणा शाह, कुम्भा और स्थपति देपाक के नाम।
दर्शन और यात्रा

उदयपुर से लगभग 90 कि.मी.; अजैन दर्शनार्थियों के लिए दोपहर 12 से शाम 5 बजे तक। मर्यादित वस्त्र पहनें; चमड़ा वर्जित है।