01बीकानेर की माँ
भक्तों की गणना के अनुसार करणी माता का जन्म 14वीं शताब्दी में एक चारण परिवार में हुआ, और कहते हैं वे लगभग 150 वर्ष जीवित रहीं और देशनोक में बसीं। राव जोधा के पुत्र राव बीका रेगिस्तान में अपना राज्य बनाने से पहले उनके पास आए; बीकानेर की परम्परा कहती है कि उन्होंने आशीर्वाद दिया और उनके क़िले की नींव रखी, और 1488 में नगर बसा। उनके बाद बीकानेर का हर राठौड़ शासक देशनोक ऐसे आता रहा जैसे माँ के पास। महाराजा गंगा सिंह ने मन्दिर को संगमरमर का अग्रभाग और नक्काशीदार चाँदी के द्वार दिए।
02काबा
मन्दिर में सुनाई जाने वाली कथा: करणी माता के कुल का एक बालक कोलायत के कपिल सरोवर में डूब गया, तो उन्होंने यम से उसे लौटाने को कहा। यम नहीं माने, तब उन्होंने घोषणा की कि उनका कुल अब यम के पास जाएगा ही नहीं; वे उनके मन्दिर में काबा बनकर जन्म लेंगे और फिर चारण बनकर लौटेंगे। इसलिए यहाँ चूहे उपद्रवी नहीं हैं। वे संगमरमर के फ़र्श पर दौड़ते हैं, चौड़ी परातों से दूध पीते हैं, और यात्री पैर घसीटकर सँभलकर चलते हैं कि किसी को चोट न लगे। काबा का चखा भोजन प्रसाद माना जाता है। गिने-चुने सफ़ेद काबा में से किसी को देख लेना स्वयं माता का दर्शन माना जाता है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1488बीकानेर की परम्परा के अनुसार राव बीका करणी माता के आशीर्वाद से बीकानेर बसाते हैं।
- लगभग 1538करणी माता के महाप्रयाण के बाद देशनोक में उनका स्थान मन्दिर बनता है।
देशनोक बीकानेर से 30 किमी दक्षिण में है और उसका अपना रेलवे स्टेशन है। जूते बाहर रहते हैं, इसलिए मोज़े पहनें; दोनों नवरात्रों में सबसे बड़े मेले लगते हैं।




