0123 मार्च 1931 की रात
23 मार्च 1931 की शाम भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर को लाहौर सेंट्रल जेल में तय समय से पहले फाँसी दे दी गई, क्योंकि अधिकारी बाहर की भीड़ से डरते थे। उसी रात शव पिछले रास्ते से निकालकर हुसैनीवाला के पास सतलुज के तट पर ले जाए गए, जहाँ उन्हें मिट्टी के तेल से जल्दी-जल्दी जलाया गया और अवशेष नदी में फेंक दिए गए। जो ग्रामीण और सम्बन्धी वहाँ पहुँचे, उन्होंने जो बचा था बटोरा। यह स्थान तुरन्त तीर्थ बन गया। केन्द्रीय असेम्बली में भगत सिंह के साथ बम फेंकने वाले बटुकेश्वर दत्त ने उनके पास दाह की इच्छा जताई, और 1965 में वही हुआ; भगत सिंह की माता विद्यावती का भी यहीं दाह हुआ।
02सन्धि से वापस
1947 की रैडक्लिफ़ रेखा ने यह दाह-स्थल पाकिस्तान की ओर छोड़ दिया। 1959–60 के सीमा-समझौतों के अन्तर्गत भारत ने 17 जनवरी 1961 को सुलेमानकी हेडवर्क्स के पास के बारह गाँव देकर इसे वापस लिया। उसी स्थान पर तीनों की प्रतिमाओं वाला स्मारक बना। 1971 के युद्ध में पाकिस्तानी सेना ने हुसैनीवाला पर अधिकार किया और स्मारक को क्षति पहुँची; बाद में उसे फिर बनाया गया। हर वर्ष 23 मार्च, शहीदी दिवस, को यहाँ मेला लगता है और पंजाब सरकार यह दिन मनाती है। पास ही हुसैनीवाला सीमा-चौकी है, जहाँ 1970 से हर शाम ध्वज उतारने का समारोह होता है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 23 मार्च 1931भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के शव यहाँ चुपके से जलाए जाते हैं।
- अगस्त 1947स्थान नई सीमा के पाकिस्तानी भाग में चला जाता है।
- 17 जनवरी 1961बारह गाँवों के बदले भारत स्थान वापस लेता है।
- 1965बटुकेश्वर दत्त का अपने साथियों के पास दाह होता है।
- दिसम्बर 1971पाकिस्तानी सेना हुसैनीवाला पर अधिकार करती है; स्मारक क्षतिग्रस्त होता है और बाद में फिर बनता है।
फ़िरोज़पुर से लगभग 10 किमी; 23 मार्च का मेला और शाम का सीमा-समारोह एक ही यात्रा में देखे जा सकते हैं।





