01गुरु अमरदास का नगर
गोइंदवाल पुरानी दिल्ली–लाहौर सड़क पर एक घाट के पास था, जहाँ गोइंदा नाम का एक व्यापारी गाँव बसाना चाहता था। गुरु अंगद के लिए प्रतिदिन सुबह ब्यास से खडूर तक जल ले जाने वाले अमरदास को उसे बसाने भेजा गया। 1552 में तीसरे गुरु बनने पर वे यहीं आ गए। उन्होंने 84 सीढ़ियों वाली बावली खुदवाई; श्रद्धालु इसमें स्नान करते हैं और हर सीढ़ी पर जपुजी का पाठ करते हैं। उन्होंने नियम बनाया कि जो भी उनसे मिलने आए, राजा हो या किसान, पहले एक पंक्ति में बैठकर लंगर खाए: पहले पंगत, फिर संगत। उन्होंने उपदेशकों की मंजी व्यवस्था बनाई, सती के विरुद्ध बोले और यहीं आनन्द साहिब की रचना की।
02गुरु अर्जन का जन्मस्थान
गोइंदवाल में भाई जेठा ने बावली और लंगर में सेवा की, 1554 में गुरु की पुत्री बीबी भानी से विवाह किया और बाद में गुरु रामदास बने। उनके सबसे छोटे पुत्र अर्जन का यहाँ 15 अप्रैल 1563 को जन्म हुआ। गुरु अमरदास के परिवार के पास रखी गोइंदवाल पोथियाँ, पहले गुरुओं के शबदों की पुस्तकें, गुरु अर्जन के आदि ग्रन्थ संकलित करते समय काम आईं। अबुल फ़ज़ल लिखता है कि 4 नवम्बर 1598 को अकबर ने गोबिन्दवाल के पास हाथी पर ब्यास पार की, और उसके वहाँ उतरने से अर्जन गुरु के घर की शोभा बढ़ी। गुरुओं के अमृतसर चले जाने के बाद भी गोइंदवाल तीर्थ बना रहा।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1552गुरु अमरदास गोइंदवाल को अपनी गद्दी बनाते हैं।
- 15 अप्रैल 1563गोइंदवाल में गुरु अर्जन का जन्म।
- 4 नवम्बर 1598अकबर यहाँ ब्यास पार करके गुरु अर्जन से मिलता है।





