आज भी खड़ा

तरनतारन साहिब

1590 में अमृतसर के दक्षिण में गुरु अर्जन देव द्वारा बसाया नगर और सरोवर। इसका सरोवर किसी भी गुरुद्वारे में सबसे बड़ा है, और नाम का अर्थ है ‘पार उतारने वाली नाव’।

निर्माण: 1590 ई., गुरु अर्जन देव; मंदिर महाराजा रणजीत सिंह के समय फिर बना और सोने से मढ़ा गयास्थान: पंजाब (तरनतारन ज़िला)31.45° N, 74.93° E
  1. 1590 ई.
  2. 30 मई 1606
  3. 19वीं शताब्दी का आरम्भ
चित्र: Unknown authorUnknown author · Public domain

01पाँचवें गुरु का नगर

गुरु अर्जन ने दो गाँवों की भूमि ख़रीदी और 1590 में एक बड़ा सरोवर खुदवाया, जिसका नाम तरनतारन रखा, संसार-सागर से पार उतारने वाली नौका। उन्होंने यहाँ कुष्ठ रोगियों के लिए आश्रय भी बनाया और स्वयं उनकी सेवा की, और बहुत समय बाद तक नगर ने वह सेवा जारी रखी। तीर्थयात्री मानते थे कि सरोवर में स्नान शरीर और मन दोनों को स्वस्थ करता है। सरोवर के किनारे का दरबार साहिब गुरु के समय बना और अमृतसर के हरमंदिर की तरह एक पथ से उस तक पहुँचते हैं।

02रणजीत सिंह का स्वर्ण

18वीं शताब्दी में सिख मिसलों ने इस स्थान की देखरेख की। महाराजा रणजीत सिंह ने 19वीं शताब्दी के आरम्भ में दरबार साहिब का पुनर्निर्माण कराया और अमृतसर की तरह इसकी ऊपरी मंज़िल को सोने चढ़े ताँबे से मढ़ा, और कुँवर नौनिहाल सिंह ने सरोवर के एक कोने पर ऊँची मीनार आरम्भ की। नगर माझा प्रदेश का केंद्र बना। 1606 में लाहौर में पाँचवें गुरु का बलिदान यहाँ विशेष श्रद्धा से याद किया जाता है।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 1590 ई.गुरु अर्जन देव ने नगर बसाया और सरोवर खुदवाया।
  2. 30 मई 1606जहाँगीर के आदेश पर लाहौर में गुरु अर्जन को मृत्यु दी गई।
  3. 19वीं शताब्दी का आरम्भमहाराजा रणजीत सिंह ने दरबार साहिब फिर बनवाया और सोने से मढ़ा।
दर्शन और यात्रा

अमृतसर से लगभग 25 किमी दक्षिण; हर अमावस्या पर बड़ी संगत जुटती है।