01एक सेठ का दान
गोकुलदास पारिख ग्वालियर के सिन्धिया शासकों के कोषाध्यक्ष थे, जिनके अधिकार में 19वीं शताब्दी के आरम्भ में मथुरा था, और श्री वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग के भक्त थे। 1814 में उन्होंने यमुना के ऊपर भीड़ भरे पुराने नगर में यह मन्दिर बनवाया: ऊँचे शिखर के बजाय नक्काशीदार द्वार और चित्रित छतों वाली चौड़े आँगन की हवेली, जैसे पुष्टिमार्ग के मन्दिर बनते हैं, क्योंकि यहाँ कृष्ण घर के स्वामी की तरह रहते हैं। द्वारकाधीश का विग्रह चतुर्भुज श्याम रूप है, पास में राधारानी।
02हिंडोला और घाट
दर्शन पुष्टिमार्ग की आठ झाँकियों के अनुसार होते हैं, भोर की मंगला से रात की शयन तक, और बीच में पट बन्द रहते हैं। श्रावण में मन्दिर हिंडोला उत्सव मनाता है: दो सप्ताह तक द्वारकाधीश और राधारानी सोने-चाँदी के झूलों पर विराजते हैं, और हर दिन आँगन अलग रंग या सामग्री से सजता है। विश्राम घाट, जहाँ कंस वध के बाद कृष्ण के विश्राम की कथा है, कुछ ही क़दम पर है, और वहाँ की साँझ की यमुना आरती अन्तिम दर्शन के बाद होती है।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- 1814दौलतराव सिन्धिया के सहयोग से सेठ गोकुलदास पारिख मन्दिर बनवाते हैं।
मन्दिर पुराने नगर में विश्राम घाट के पास, कृष्ण जन्मभूमि से लगभग 2 किमी है; झाँकियों के बीच दर्शन बन्द रहते हैं।




