01विष्णु की तीन खिड़कियाँ
मन्दिर एक चौड़े चबूतरे पर है; बीच में छोटा चौकोर गर्भगृह और कभी कोनों पर चार छोटे मन्दिर थे। तीन ओर खुले द्वारों के स्थान पर दीवारों पर खिड़कियों जैसे बड़े उत्कीर्ण फलक हैं। दक्षिण में विष्णु शेष की कुण्डलियों पर लेटे हैं, चरणों में लक्ष्मी, नाभि-कमल पर ब्रह्मा, और ऊपर नन्दी पर शिव-पार्वती। पूर्व में बदरिकाश्रम में नर और नारायण तप में बैठे हैं। उत्तर में विष्णु गरुड़ पर उतरकर गजराज गजेन्द्र को जल-सर्प से बचाते हैं। पश्चिम का द्वार गंगा और यमुना से घिरा है।
02फिर से मिला
अलेक्ज़ेण्डर कनिंघम के सर्वेक्षण ने 1875 में खण्डहरों के चित्र लिए, और पुरातत्व सर्वेक्षण के एम. एस. वत्स ने 1930 के दशक में मन्दिर का उत्खनन और अध्ययन किया; उनका ग्रन्थ ‘द गुप्त टेम्पल ऐट देवगढ़’ 1952 में छपा। शिखर गिर चुका है। ऊपर पहाड़ी पर क़िले की दीवारों के पीछे 9वीं से 12वीं शताब्दी के लगभग तीस जैन मन्दिर हैं, और बेतवा के ऊपर चट्टान पर उकेरी प्रतिमाएँ हैं।
इस स्थान की जीवन-गाथा
- लगभग 500 ई.गुप्तों के समय मन्दिर बनता है।
- 1875कनिंघम का सर्वेक्षण खण्डहरों के चित्र लेता है।
- 1952एम. एस. वत्स ‘द गुप्त टेम्पल ऐट देवगढ़’ प्रकाशित करते हैं।
ललितपुर से लगभग 33 किलोमीटर; निकटतम बड़ा स्टेशन झाँसी है। जैन पहाड़ी और बेतवा की घाटी साथ देखें।



