चित्र: Ms Sarah Welch · CC BY-SA 4.0
आचार्य

आचार्य भद्रबाहु

अन्तिम श्रुतकेवली; चन्द्रगुप्त मौर्य के जैन गुरु

चौथी शताब्दी ई.पू. (जैन परंपरा)

भद्रबाहु अन्तिम श्रुतकेवली थे, यानी वे अन्तिम आचार्य जिन्हें महावीर की सम्पूर्ण वाणी कण्ठस्थ थी। दिगम्बर परंपरा के अनुसार उन्होंने उत्तर में बारह वर्ष के अकाल का पूर्वाभास पाया, चन्द्रगुप्त मौर्य को शिष्य रूप में साथ लेकर संघ को दक्षिण ले गए, और श्रवणबेलगोला में सल्लेखना से देह त्यागी।

01दक्षिण की ओर, चन्द्रगिरि तक

दिगम्बर वृत्तान्त कहता है कि भद्रबाहु ने मगध में बारह वर्ष के अकाल के लक्षण पहचाने और कई हज़ार मुनियों को दक्षिण कर्नाटक ले गए। चन्द्रगुप्त मौर्य ने राजपाट छोड़ा और प्रभाचन्द्र नाम से मुनि बनकर साथ गए। श्रवणबेलगोला की छोटी पहाड़ी पर, जिसे परंपरा राजा के नाम पर चन्द्रगिरि कहती है, वृद्ध आचार्य ने अन्त निकट जानकर संघ को आगे भेजा और सल्लेखना का व्रत लिया। उस पहाड़ी की एक गुफा आज भी भद्रबाहु गुफा कहलाती है, जहाँ चट्टान में उनके चरण-चिह्न उकेरे हैं। चन्द्रगिरि का लगभग 600 ई. का एक अभिलेख, वहाँ के सबसे पुराने अभिलेखों में से, इस प्रवास का उल्लेख करता है।

02दो परंपराएँ, एक आचार्य

श्वेताम्बर उन्हें दूसरे रूप में याद करते हैं। उनके अनुसार भद्रबाहु महाप्राण ध्यान साधने नेपाल गए, और स्थूलभद्र वहीं उनसे चौदह पूर्वों का ज्ञान लेने आए, जो आगम की सबसे प्राचीन परत है। श्वेताम्बर उन्हें कल्पसूत्र का रचयिता भी मानते हैं, जो हर वर्ष पर्युषण में पढ़ा जाता है और जिसमें महावीर का जीवन है। दोनों संघ उनके देहावसान को महावीर-निर्वाण के लगभग 160 से 170 वर्ष बाद रखते हैं, कुछ वर्षों के अन्तर से। दिगम्बर और श्वेताम्बर का भेद प्रायः उसी अकाल के समय से जोड़ा जाता है, जब संघ का एक भाग दक्षिण गया और दूसरा मगध में रहा।

पाटलिपुत्र
स्थान · अजातशत्रु ने दुर्ग बनाया, उदयिन ने राजधानी बनाया, 5वीं शताब्दी ई.पू.पाटलिपुत्रमगध, नन्दों, मौर्यों और गुप्तों की राजधानी, गंगा तट पर जहाँ कभी सोन मिलती थी। आज के पटना के नीचे वह काष्ठ-प्राचीर है जिसका वर्णन मेगस्थनीज़ ने किया, और मौर्यों का स्तम्भ-मण्डप।पढ़ें →