श्वेताश्वतरोपनिषद्

अध्याय 3: रुद्र एक है, दूसरा नहीं

21 श्लोक · 3 में से 6

इस अध्याय में क्या होता है

रुद्र एक है, दूसरा नहीं

सृष्टि का जाल धारण करने वाला एक ही देव अपनी शक्तियों से सब लोकों पर शासन करता है; जो उसे जानते हैं, वे अमृत होते हैं। रुद्र एक ही है, दूसरा कोई उसके सामने नहीं ठहरता। वह हर प्राणी में बसता है, लोकों को रचता और पालता है, और अन्त में समेट लेता है। प्रार्थना है: हे रुद्र, अपना शिव रूप दिखाओ, और मनुष्य तथा पशुओं की हिंसा न करो। उपनिषद् कहता है: मैं उस महान् पुरुष को जानता हूँ, जो सूर्य के समान तेजस्वी और अन्धकार से परे है; उसे जानकर ही मनुष्य मृत्यु के पार जाता है, दूसरा मार्ग नहीं। बिना हाथ-पैर के वह पकड़ता और चलता है, बिना आँख-कान के देखता और सुनता है। अणु से भी अणु, महान् से भी महान्, वह हृदय में छिपा है।

3.1

य एको जालवानीशत ईशनीभिः सर्वांल्लोकानीशत ईशनीभिः ।
य एवैक उद्भवे सम्भवे च य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति

ya eko jālavānīśata īśanībhiḥ sarvāṃllokānīśata īśanībhiḥ |
ya evaika udbhave sambhave ca ya etadviduramṛtāste bhavanti

जो एक परमेश्वर माया रूपी जाल के स्वामी हैं, वे अपनी शक्तियों से शासन करते हैं, अपनी शक्तियों से सब लोकों पर शासन करते हैं। सृष्टि के उदय और विस्तार में वही एक हैं। जो उन्हें जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं।

3.2

एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमांल्लोकानीशत ईशनीभिः ।
प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति सञ्चुकोचान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः

eko hi rudro na dvitīyāya tasthurya imāṃllokānīśata īśanībhiḥ |
pratyaṅjanāstiṣṭhati sañcukocāntakāle saṃsṛjya viśvā bhuvanāni gopāḥ

रुद्र एक ही हैं, ज्ञानी किसी दूसरे को नहीं मानते। वे अपनी शक्तियों से इन लोकों पर शासन करते हैं और प्रत्येक प्राणी के भीतर स्थित हैं। सब भुवनों को रचकर और उनकी रक्षा करके प्रलय के समय वे उन्हें अपने में समेट लेते हैं।

3.3

विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् ।
सम्बाहुभ्यां धमति सम्पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन्देव एकः

viśvataścakṣuruta viśvatomukho viśvatobāhuruta viśvataspāt |
sambāhubhyāṃ dhamati sampatatrairdyāvābhūmī janayandeva ekaḥ

उनकी आँखें सब ओर हैं, मुख सब ओर हैं, भुजाएँ सब ओर हैं और चरण सब ओर हैं। वही एक देव द्युलोक और पृथ्वी को उत्पन्न करते हुए अपनी भुजाओं और पंखों से उन्हें गढ़ते हैं।

3.4

यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः ।
हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु

yo devānāṃ prabhavaścodbhavaśca viśvādhipo rudro maharṣiḥ |
hiraṇyagarbhaṃ janayāmāsa pūrvaṃ sa no buddhyā śubhayā saṃyunaktu

जो देवताओं के उद्गम और उत्पत्ति के कारण हैं, विश्व के अधिपति हैं, महर्षि रुद्र हैं, जिन्होंने आदि में हिरण्यगर्भ को उत्पन्न किया, वे हमें शुभ बुद्धि से युक्त करें।

3.5

या ते रुद्रा शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी ।
तया नस्तनुवा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि

yā te rudrā śivā tanūraghorā'pāpakāśinī |
tayā nastanuvā śantamayā giriśantābhicākaśīhi

हे गिरिशंत रुद्र, आपका जो कल्याणमय, सौम्य, अघोर और पुण्य को प्रकाशित करने वाला रूप है, उसी परम मंगलमय रूप से हमारी ओर कृपादृष्टि करें।

3.6

यामिषुं गिरिशतं हस्ते बिभर्ष्यस्तवे ।
शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिंसीः पुरुषं जगत्

yāmiṣuṃ giriśataṃ haste bibharṣyastave |
śivāṃ giritra tāṃ kuru mā hiṃsīḥ puruṣaṃ jagat

हे गिरिशंत, जो बाण आप छोड़ने के लिए हाथ में धारण करते हैं, हे गिरित्र, उसे कल्याणकारी बना दीजिए। मनुष्य और इस जगत की हिंसा न करें।

3.7

ततः परं ब्रह्म परं बृहन्तं यथा निकायं सर्वभूतेषु गूढम् ।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वाऽमृता भवन्ति

tataḥ paraṃ brahma paraṃ bṛhantaṃ yathā nikāyaṃ sarvabhūteṣu gūḍham |
viśvasyaikaṃ pariveṣṭitāramīśaṃ taṃ jñātvā'mṛtā bhavanti

इससे परे परब्रह्म है, जो महान है और प्राणियों के शरीरों के अनुसार सब भूतों में छिपा हुआ है। जो एक विश्व को चारों ओर से घेरे हुए है, उस ईश्वर को जानकर मनुष्य अमर हो जाते हैं।

3.8

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय

vedāhametaṃ puruṣaṃ mahāntamādityavarṇaṃ tamasaḥ parastāt |
tameva viditvātimṛtyumeti nānyaḥ panthā vidyate'yanāya

मैं उस महान पुरुष को जानता हूँ, जो सूर्य के समान तेजस्वी और अंधकार से परे है। उसी को जानकर मनुष्य मृत्यु को पार करता है; परम पद तक जाने का कोई दूसरा मार्ग नहीं है।

3.9

यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद्यस्मान्नणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् ।
वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्

yasmātparaṃ nāparamasti kiṃcidyasmānnaṇīyo na jyāyo'sti kaścit |
vṛkṣa iva stabdho divi tiṣṭhatyekastenedaṃ pūrṇaṃ puruṣeṇa sarvam

उनसे परे कुछ नहीं, उनसे भिन्न कुछ नहीं; उनसे सूक्ष्म कोई नहीं और उनसे बड़ा कोई नहीं। वे एक वृक्ष के समान द्युलोक में अचल खड़े हैं। उसी पुरुष से यह सब परिपूर्ण है।

3.10

ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम् ।
य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति

tato yaduttarataraṃ tadarūpamanāmayam |
ya etadviduramṛtāste bhavantyathetare duḥkhamevāpiyanti

जो इस जगत से भी परे है, वह रूपरहित और दुःखरहित है। जो उसे जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं; बाकी लोग दुःख को ही प्राप्त होते हैं।

3.11

सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहाशयः ।
सर्वव्यापी स भगवांस्तस्मात्सर्वगतः शिवः

sarvānanaśirogrīvaḥ sarvabhūtaguhāśayaḥ |
sarvavyāpī sa bhagavāṃstasmātsarvagataḥ śivaḥ

सबके मुख, सिर और गर्दनें उन्हीं की हैं। वे सब प्राणियों के हृदय रूपी गुफा में रहते हैं। वे सर्वव्यापी भगवान हैं, इसलिए शिव सर्वत्र विद्यमान हैं।

3.12

महान्प्रभुर्वै पुरुषः सत्वस्यैष प्रवर्तकः ।
सुनिर्मलामिमां प्राप्तिमीशानो ज्योतिरव्ययः

mahānprabhurvai puruṣaḥ satvasyaiṣa pravartakaḥ |
sunirmalāmimāṃ prāptimīśāno jyotiravyayaḥ

वह पुरुष ही महान प्रभु है, जो अंतःकरण को इस परम निर्मल प्राप्ति की ओर प्रेरित करता है। वही शासक है, वही अविनाशी ज्योति है।

3.13

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः ।
हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति

aṅguṣṭhamātraḥ puruṣo'ntarātmā sadā janānāṃ hṛdaye sanniviṣṭaḥ |
hṛdā manīṣā manasābhiklṛpto ya etadviduramṛtāste bhavanti

अंगूठे के बराबर अंतरात्मा पुरुष सदा प्राणियों के हृदय में स्थित है। वह हृदय, विवेक और मन से जाना जाता है। जो इसे जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं।

3.14

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
स भूमिं विश्वतो वृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्

sahasraśīrṣā puruṣaḥ sahasrākṣaḥ sahasrapāt |
sa bhūmiṃ viśvato vṛtvā'tyatiṣṭhaddaśāṅgulam

वह पुरुष सहस्र सिरों, सहस्र आँखों और सहस्र चरणों वाला है। पृथ्वी को सब ओर से घेरकर भी वह उससे दस अंगुल परे स्थित है।

3.15

पुरुष एवेदँसर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति

puruṣa evedam̐sarvaṃ yadbhūtaṃ yacca bhavyam |
utāmṛtatvasyeśāno yadannenātirohati

जो कुछ हो चुका है और जो होने वाला है, यह सब पुरुष ही है। वही अमृतत्व का स्वामी है और अन्न से बढ़ने वाले सब प्राणियों का भी।

3.16

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति

sarvataḥ pāṇipādaṃ tatsarvato'kṣiśiromukham |
sarvataḥ śrutimalloke sarvamāvṛtya tiṣṭhati

उसके हाथ पैर सब ओर हैं, आँखें, सिर और मुख सब ओर हैं, कान भी जगत में सब ओर हैं। वह सबको घेरकर स्थित है।

3.17

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं सुहृत्

sarvendriyaguṇābhāsaṃ sarvendriyavivarjitam |
sarvasya prabhumīśānaṃ sarvasya śaraṇaṃ suhṛt

वह सब इंद्रियों के गुणों के रूप में प्रकाशित होता है, फिर भी सब इंद्रियों से रहित है। वह सबका स्वामी, सबका शासक, सबकी शरण और सबका सुहृद है।

3.18

नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः ।
वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च

navadvāre pure dehī haṃso lelāyate bahiḥ |
vaśī sarvasya lokasya sthāvarasya carasya ca

नौ द्वारों वाले नगर रूपी शरीर में रहने वाला हंस, देही आत्मा, बाहर की ओर क्रीड़ा करता है। वही सम्पूर्ण जगत का, स्थावर और जंगम सबका स्वामी है।

3.19

अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः ।
स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्

apāṇipādo javano grahītā paśyatyacakṣuḥ sa śṛṇotyakarṇaḥ |
sa vetti vedyaṃ na ca tasyāsti vettā tamāhuragryaṃ puruṣaṃ mahāntam

हाथों के बिना वह पकड़ता है, पैरों के बिना तेज चलता है, आँखों के बिना देखता है और कानों के बिना सुनता है। वह सब जानने योग्य को जानता है, पर उसे जानने वाला कोई नहीं। उसे आदि और महान पुरुष कहते हैं।

3.20

अणोरणीयान्महतो महीयानात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः ।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमीशम्

aṇoraṇīyānmahato mahīyānātmā guhāyāṃ nihito'sya jantoḥ |
tamakratuḥ paśyati vītaśoko dhātuḥ prasādānmahimānamīśam

अणु से भी सूक्ष्म और महान से भी महान आत्मा प्रत्येक प्राणी के हृदय रूपी गुफा में स्थित है। कामनारहित और शोकरहित साधक विधाता की कृपा से उस ईश्वर और उसकी महिमा का दर्शन करता है।

3.21

वेदाहमेतमजरं पुराणं सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्वात् ।
जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवादिनो हि प्रवदन्ति नित्यम्

vedāhametamajaraṃ purāṇaṃ sarvātmānaṃ sarvagataṃ vibhutvāt |
janmanirodhaṃ pravadanti yasya brahmavādino hi pravadanti nityam

मैं उसे जानता हूँ, जो अजर, पुरातन, सबका आत्मा और अपनी व्यापकता से सर्वत्र विद्यमान है। ब्रह्मवादी कहते हैं कि उसका जन्म नहीं होता, वे उसे नित्य कहते हैं।

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