श्वेताश्वतरोपनिषद्

अध्याय 2: सविता की प्रार्थना और योग की साधना

17 श्लोक · 2 में से 6

इस अध्याय में क्या होता है

सविता की प्रार्थना और योग की साधना

अध्याय सविता से प्रार्थनाओं से खुलता है कि वे हमारे मन और बुद्धि को सत्य में जोड़ें और प्रकाश तक ले जाएँ। फिर योग की विधि बताई गई है। छाती, गर्दन और सिर को एक सीध में रखकर शरीर सीधा रखो, इन्द्रियों और मन को हृदय में समेटो, और ब्रह्म की नौका से भयानक धाराओं को पार करो। शुद्ध, समतल, शान्त और हवा से सुरक्षित स्थान में प्राण को धीरे से संयमित करो। ब्रह्म के प्रकट होने से पहले कोहरा, धुआँ, जुगनू, बिजली जैसे रूप दिखते हैं। प्रगति के पहले लक्षण हैं हल्कापन, आरोग्य, स्थिरता, निर्मल वर्ण और मधुर स्वर। जो योगी आत्मा को दीपक की भाँति देखता है, वह सब बन्धनों से छूटता है। अग्नि, जल, ओषधियों और वनस्पतियों में बसे देव को नमस्कार।

2.1

युञ्जानः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः ।
अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या अध्याभरत्

yuñjānaḥ prathamaṃ manastattvāya savitā dhiyaḥ |
agnerjyotirnicāyya pṛthivyā adhyābharat

सबके प्रेरक सविता देव ने सत्य की खोज के लिए पहले मन और बुद्धि को जोड़ा, अग्नि की ज्योति को देखा और उसे पृथ्वी से ऊपर लाकर प्रतिष्ठित किया।

2.2

युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितुः सवे ।
सुवर्गेयाय शक्त्या

yuktena manasā vayaṃ devasya savituḥ save |
suvargeyāya śaktyā

सविता देव की प्रेरणा से, योग में जुड़े मन के साथ, हम पूरी शक्ति से स्वर्ग की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करें।

2.3

युक्त्वाय मनसा देवान् सुवर्यतो धिया दिवम् ।
बृहज्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्रसुवाति तान्

yuktvāya manasā devān suvaryato dhiyā divam |
bṛhajjyotiḥ kariṣyataḥ savitā prasuvāti tān

स्वर्ग की ओर जाने वाली इंद्रियों को मन से और प्रकाशमान लोक को बुद्धि से जोड़कर, सविता देव उन्हें उस महान ज्योति को प्रकट करने के लिए प्रेरित करें।

2.4

युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः ।
विहोत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः

yuñjate mana uta yuñjate dhiyo viprā viprasya bṛhato vipaścitaḥ |
vihotrā dadhe vayunāvideka inmahī devasya savituḥ pariṣṭutiḥ

महान सर्वज्ञ परमेश्वर के ज्ञानी उपासक अपने मन और बुद्धि को उसमें लगाते हैं। सब विधियों को जानने वाले वही एक यज्ञ के कर्मों को स्थापित करते हैं। सविता देव की महिमा महान है।

2.5

युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्विश्लोक एतु पथ्येव सूरेः ।
शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः

yuje vāṃ brahma pūrvyaṃ namobhirviśloka etu pathyeva sūreḥ |
śṛṇvantu viśve amṛtasya putrā ā ye dhāmāni divyāni tasthuḥ

मैं नमस्कारों के साथ आप दोनों से, उस सनातन ब्रह्म से जुड़ता हूँ। मेरी स्तुति सूर्य के मार्ग की तरह आगे फैले। अमृत के सब पुत्र, जो दिव्य धामों में रहते हैं, इसे सुनें।

2.6

अग्निर्यत्राभिमथ्यते वायुर्यत्राधिरुध्यते ।
सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र सञ्जायते मनः

agniryatrābhimathyate vāyuryatrādhirudhyate |
somo yatrātiricyate tatra sañjāyate manaḥ

जहाँ अग्नि का मंथन होता है, जहाँ वायु का निरोध होता है, जहाँ सोमरस छलकता है, वहीं मन उत्पन्न होता है, अर्थात ध्यान में ऊपर उठता है।

2.7

सवित्रा प्रसवेन जुषेत ब्रह्म पूर्व्यम् ।
यत्र योनिं कृणवसे न हि ते पूर्तमक्षिपत्

savitrā prasavena juṣeta brahma pūrvyam |
yatra yoniṃ kṛṇavase na hi te pūrtamakṣipat

सविता की प्रेरणा से उस सनातन ब्रह्म की उपासना में रमो। उसी को अपना आश्रय बनाओ, तब तुम्हारे पूर्व कर्म तुम्हें बाँधेंगे नहीं।

2.8

त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा सन्निवेश्य ।
ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान्स्रोतांसि सर्वाणि भयानकानि

trirunnataṃ sthāpya samaṃ śarīraṃ hṛdīndriyāṇi manasā sanniveśya |
brahmoḍupena pratareta vidvānsrotāṃsi sarvāṇi bhayānakāni

छाती, गर्दन और सिर को सीधा रखकर शरीर को स्थिर करे, मन के द्वारा इंद्रियों को हृदय में स्थापित करे। ऐसा ज्ञानी ब्रह्म रूपी नौका, ओंकार, से सब भयानक प्रवाहों को पार कर ले।

2.9

प्राणान्प्रपीड्येह स युक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्वसीत ।
दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान्मनो धारयेताप्रमत्तः

prāṇānprapīḍyeha sa yuktaceṣṭaḥ kṣīṇe prāṇe nāsikayocchvasīta |
duṣṭāśvayuktamiva vāhamenaṃ vidvānmano dhārayetāpramattaḥ

यहाँ प्राणों का संयम करके, चेष्टाओं को वश में रखकर, प्राण के शांत होने पर नासिका से धीरे श्वास छोड़े। जैसे दुष्ट घोड़ों वाले रथ को सारथी सँभालता है, वैसे ही ज्ञानी सावधान रहकर मन को धारण करे।

2.10

समे शुचौ शर्करावह्निवालुकाविवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः ।
मनोनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत्

same śucau śarkarāvahnivālukāvivarjite śabdajalāśrayādibhiḥ |
manonukūle na tu cakṣupīḍane guhānivātāśrayaṇe prayojayet

समतल और पवित्र स्थान पर, जहाँ कंकड़, अग्नि और बालू न हों, जहाँ का शब्द, जल और आश्रय मन के अनुकूल हो, जो आँखों को कष्ट न दे, ऐसी गुफा या वायु से बचे स्थान में योग का अभ्यास करे।

2.11

नीहारधूमार्कानिलानलानां खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् ।
एतानि रूपाणि पुरःसराणि ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे

nīhāradhūmārkānilānalānāṃ khadyotavidyutsphaṭikaśaśīnām |
etāni rūpāṇi puraḥsarāṇi brahmaṇyabhivyaktikarāṇi yoge

कुहासा, धुआँ, सूर्य, वायु, अग्नि, जुगनू, बिजली, स्फटिक और चंद्रमा, ये रूप योग में पहले दिखाई देते हैं और ब्रह्म की अभिव्यक्ति की सूचना देते हैं।

2.12

पृथिव्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते ।
न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम्

pṛthivyaptejo'nilakhe samutthite pañcātmake yogaguṇe pravṛtte |
na tasya rogo na jarā na mṛtyuḥ prāptasya yogāgnimayaṃ śarīram

जब पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश से जुड़ा पाँच प्रकार का योगगुण प्रकट होता है, तब योगी को योगाग्निमय शरीर मिलता है। उसके लिए न रोग है, न बुढ़ापा, न मृत्यु।

2.13

लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वं वर्णप्रसादं स्वरसौष्ठवं च ।
गन्धः शुभो मूत्रपुरीषमल्पं योगप्रवृत्तिं प्रथमां वदन्ति

laghutvamārogyamalolupatvaṃ varṇaprasādaṃ svarasauṣṭhavaṃ ca |
gandhaḥ śubho mūtrapurīṣamalpaṃ yogapravṛttiṃ prathamāṃ vadanti

शरीर का हल्कापन, आरोग्य, लोभ का अभाव, मुख की कांति, स्वर की मधुरता, शुभ गंध और मल मूत्र की कमी, इन्हें योग में प्रगति के पहले लक्षण कहा गया है।

2.14

यथैव बिम्बं मृदयोपलिप्तं तेजोमयं भ्राजते तत्सुधान्तम् ।
तद्वाऽऽत्मतत्त्वं प्रसमीक्ष्य देही एकः कृतार्थो भवते वीतशोकः

yathaiva bimbaṃ mṛdayopaliptaṃ tejomayaṃ bhrājate tatsudhāntam |
tadvā''tmatattvaṃ prasamīkṣya dehī ekaḥ kṛtārtho bhavate vītaśokaḥ

जैसे मिट्टी से ढका दर्पण साफ होने पर तेज से चमक उठता है, वैसे ही देहधारी आत्मतत्त्व का साक्षात्कार करके एक, कृतार्थ और शोकरहित हो जाता है।

2.15

यदात्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत् ।
अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपापैः

yadātmatattvena tu brahmatattvaṃ dīpopameneha yuktaḥ prapaśyet |
ajaṃ dhruvaṃ sarvatattvairviśuddhaṃ jñātvā devaṃ mucyate sarvapāpaiḥ

जब योगी दीपक के समान आत्मतत्त्व के द्वारा ब्रह्मतत्त्व को देखता है, जो अजन्मा, अचल और सब तत्त्वों से शुद्ध है, तब उस परमदेव को जानकर वह सब पापों से छूट जाता है।

2.16

एषो ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः ।
स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति सर्वतोमुखः

eṣo ha devaḥ pradiśo'nu sarvāḥ pūrvo ha jātaḥ sa u garbhe antaḥ |
sa eva jātaḥ sa janiṣyamāṇaḥ pratyaṅjanāstiṣṭhati sarvatomukhaḥ

यही परमदेव सब दिशाओं में व्याप्त हैं। वही सबसे पहले प्रकट हुए और वही गर्भ के भीतर विराजते हैं। जो उत्पन्न हुआ और जो उत्पन्न होगा, वह वही है। सब ओर मुख वाले वे प्रत्येक प्राणी के भीतर स्थित हैं।

2.17

यो देवोऽग्नौ योऽप्सु यो विश्वं भुवनमाविवेश ।
य ओषधीषु यो वनस्पतिषु तस्मै देवाय नमो नमः

yo devo'gnau yo'psu yo viśvaṃ bhuvanamāviveśa |
ya oṣadhīṣu yo vanaspatiṣu tasmai devāya namo namaḥ

जो परमदेव अग्नि में हैं, जो जल में हैं, जो सम्पूर्ण भुवन में प्रवेश किए हुए हैं, जो औषधियों में और वनस्पतियों में हैं, उस देव को बार बार नमस्कार।

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)