श्वेताश्वतरोपनिषद्

अध्याय 4: माया, मायी और दो पक्षी

22 श्लोक · 4 में से 6

इस अध्याय में क्या होता है

माया, मायी और दो पक्षी

वह एक, स्वयं वर्ण-रहित, अपनी शक्ति से वस्तुओं को अनेक वर्ण देता है। वही अग्नि, सूर्य, वायु और चन्द्रमा है, नक्षत्र, जल और प्रजापति है; वही पुरुष और स्त्री, कुमार और कुमारी है, लाठी के सहारे चलता वृद्ध है। लाल, श्वेत और काली एक अजा अपने जैसी अनेक प्रजाएँ रचती है; एक अज उसका भोग करता है, दूसरा उसे छोड़ देता है। एक वृक्ष पर दो पक्षियों की उपमा फिर आती है। प्रकृति को माया जानो और महेश्वर को मायी; यह सारा जगत् उसके अंशों से भरा है। घी के ऊपर की महीन परत की भाँति सब प्राणियों में छिपे शिव को जानकर मनुष्य सब बन्धनों से छूटता है। अन्त में रुद्र से प्रार्थना है कि हमारी सन्तान, आयु और पशुओं की हिंसा न करें।

4.1

य एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगाद्वर्णाननेकान्निहितार्थो दधाति ।
विचैति चान्ते विश्वमादौ च देवः स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु

ya eko'varṇo bahudhā śaktiyogādvarṇānanekānnihitārtho dadhāti |
vicaiti cānte viśvamādau ca devaḥ sa no buddhyā śubhayā saṃyunaktu

जो स्वयं एक और वर्णरहित हैं, फिर भी अपनी शक्ति के योग से किसी गूढ़ प्रयोजन के लिए अनेक वर्ण धारण करते हैं, आदि में जिनसे विश्व प्रकट होता है और अंत में जिनमें लीन होता है, वे परमदेव हमें शुभ बुद्धि से युक्त करें।

4.2

तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः ।
तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदापस्तत्प्रजापतिः

tadevāgnistadādityastadvāyustadu candramāḥ |
tadeva śukraṃ tadbrahma tadāpastatprajāpatiḥ

वही अग्नि है, वही सूर्य है, वही वायु है, वही चंद्रमा है। वही शुक्र अर्थात दीप्तिमान बीज है, वही ब्रह्म है, वही जल है और वही प्रजापति है।

4.3

त्वं स्त्री पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी ।
त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः

tvaṃ strī pumānasi tvaṃ kumāra uta vā kumārī |
tvaṃ jīrṇo daṇḍena vañcasi tvaṃ jāto bhavasi viśvatomukhaḥ

आप ही स्त्री हैं, आप ही पुरुष हैं, आप ही कुमार और कुमारी हैं। आप ही बूढ़े होकर लाठी के सहारे चलते हैं। जन्म लेकर आप ही सब ओर मुख वाले होते हैं।

4.4

नीलः पतङ्गो हरितो लोहिताक्षस्तडिद्गर्भ ऋतवः समुद्राः ।
अनादिमत्त्वं विभुत्वेन वर्तसे यतो जातानि भुवनानि विश्वा

nīlaḥ pataṅgo harito lohitākṣastaḍidgarbha ṛtavaḥ samudrāḥ |
anādimattvaṃ vibhutvena vartase yato jātāni bhuvanāni viśvā

आप ही नीला भौंरा हैं, लाल आँखों वाला हरा तोता हैं, बिजली को गर्भ में रखने वाला मेघ हैं, ऋतुएँ और समुद्र हैं। आप अनादि हैं और अपनी व्यापकता से सर्वत्र विद्यमान हैं; आप ही से सब भुवन उत्पन्न हुए।

4.5

अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः ।
अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः

ajāmekāṃ lohitaśuklakṛṣṇāṃ bahvīḥ prajāḥ sṛjamānāṃ sarūpāḥ |
ajo hyeko juṣamāṇo'nuśete jahātyenāṃ bhuktabhogāmajo'nyaḥ

एक अजन्मी प्रकृति है, जो लाल, सफेद और काली है, अर्थात तीन गुणों वाली, और अपने जैसी बहुत सी प्रजा उत्पन्न करती है। एक अजन्मा जीव उसमें आसक्त होकर उसके साथ रहता है, और दूसरा अजन्मा, भोग पूरे करके, उसे त्याग देता है।

4.6

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति

dvā suparṇā sayujā sakhāyā samānaṃ vṛkṣaṃ pariṣasvajāte |
tayoranyaḥ pippalaṃ svādvattyanaśnannanyo'bhicākaśīti

साथ रहने वाले दो सखा पक्षी एक ही वृक्ष पर बैठे हैं। उनमें से एक उस वृक्ष के स्वादिष्ट फल खाता है, और दूसरा कुछ न खाकर केवल देखता रहता है।

4.7

समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः ।
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः

samāne vṛkṣe puruṣo nimagno'nīśayā śocati muhyamānaḥ |
juṣṭaṃ yadā paśyatyanyamīśamasya mahimānamiti vītaśokaḥ

उसी वृक्ष पर डूबा हुआ जीव मोहित होकर अपनी असमर्थता पर शोक करता है। जब वह दूसरे को, उपासकों द्वारा सेवित ईश्वर को और उनकी महिमा को देखता है, तब शोक से मुक्त हो जाता है।

4.8

ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः ।
यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते

ṛco akṣare parame vyomanyasmindevā adhi viśve niṣeduḥ |
yastaṃ na veda kimṛcā kariṣyati ya ittadvidusta ime samāsate

ऋचाएँ उस अक्षर परम व्योम में प्रतिष्ठित हैं, जिसमें सब देवता विराजते हैं। जो उसे नहीं जानता, वह ऋचाओं से क्या करेगा? जो उसे जानते हैं, वही कृतार्थ होकर स्थित रहते हैं।

4.9

छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति ।
अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्तस्मिंश्चान्यो मायया सन्निरुद्धः

chandāṃsi yajñāḥ kratavo vratāni bhūtaṃ bhavyaṃ yacca vedā vadanti |
asmānmāyī sṛjate viśvametattasmiṃścānyo māyayā sanniruddhaḥ

छंद, यज्ञ, क्रतु, व्रत, भूत, भविष्य और जो कुछ वेद कहते हैं, यह सब विश्व माया के स्वामी परमेश्वर इसी से रचते हैं, और उसी में दूसरा, अर्थात जीव, माया से बँधा रहता है।

4.10

मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं च महेश्वरम् ।
तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत्

māyāṃ tu prakṛtiṃ vidyānmāyinaṃ ca maheśvaram |
tasyāvayavabhūtaistu vyāptaṃ sarvamidaṃ jagat

प्रकृति को माया जानो और महेश्वर को मायावी, अर्थात माया का स्वामी। यह सम्पूर्ण जगत उन्हीं के अंग रूप प्राणियों से व्याप्त है।

4.11

यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको यस्मिन्निदं सं च विचैति सर्वम् ।
तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति

yo yoniṃ yonimadhitiṣṭhatyeko yasminnidaṃ saṃ ca vicaiti sarvam |
tamīśānaṃ varadaṃ devamīḍyaṃ nicāyyemāṃ śāntimatyantameti

जो एक ही प्रत्येक योनि के अधिष्ठाता हैं, जिनमें यह सब मिलता और विलीन होता है, उन वरदायक, स्तुति योग्य ईशान देव का साक्षात्कार करके साधक इस परम शांति को सदा के लिए पा लेता है।

4.12

यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः ।
हिरण्यगर्भं पश्यत जायमानं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु

yo devānāṃ prabhavaścodbhavaśca viśvādhipo rudro maharṣiḥ |
hiraṇyagarbhaṃ paśyata jāyamānaṃ sa no buddhyā śubhayā saṃyunaktu

जो देवताओं के उद्गम और उत्पत्ति के कारण हैं, विश्व के अधिपति हैं, महर्षि रुद्र हैं, जिन्होंने हिरण्यगर्भ को उत्पन्न होते देखा, वे हमें शुभ बुद्धि से युक्त करें।

4.13

यो देवानामधिपो यस्मिन्ल्लोका अधिश्रिताः ।
य ईशेऽस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम

yo devānāmadhipo yasminllokā adhiśritāḥ |
ya īśe'sya dvipadaścatuṣpadaḥ kasmai devāya haviṣā vidhema

जो देवताओं के अधिपति हैं, जिनमें सब लोक आश्रित हैं, जो दो पैर और चार पैर वाले सब प्राणियों पर शासन करते हैं, उन परमदेव के सिवा हम किस देवता को हवि अर्पित करें?

4.14

सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् ।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति

sūkṣmātisūkṣmaṃ kalilasya madhye viśvasya sraṣṭāramanekarūpam |
viśvasyaikaṃ pariveṣṭitāraṃ jñātvā śivaṃ śāntimatyantameti

जो सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म हैं, अव्यवस्था के बीच में स्थित हैं, अनेक रूपों में विश्व के रचयिता हैं और अकेले सारे विश्व को घेरे हुए हैं, उन कल्याणमय शिव को जानकर साधक सदा के लिए शांति पाता है।

4.15

स एव काले भुवनस्य गोप्ता विश्वाधिपः सर्वभूतेषु गूढः ।
यस्मिन्युक्ता ब्रह्मर्षयो देवताश्च तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिनत्ति

sa eva kāle bhuvanasya goptā viśvādhipaḥ sarvabhūteṣu gūḍhaḥ |
yasminyuktā brahmarṣayo devatāśca tamevaṃ jñātvā mṛtyupāśāṃśchinatti

वही समय पर भुवन के रक्षक हैं, विश्व के अधिपति हैं और सब प्राणियों में छिपे हैं। ब्रह्मर्षि और देवता उन्हीं में जुड़े हुए हैं। उन्हें इस प्रकार जानकर मनुष्य मृत्यु के पाश काट देता है।

4.16

घृतात्परं मण्डमिवातिसूक्ष्मं ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गूढम् ।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः

ghṛtātparaṃ maṇḍamivātisūkṣmaṃ jñātvā śivaṃ sarvabhūteṣu gūḍham |
viśvasyaikaṃ pariveṣṭitāraṃ jñātvā devaṃ mucyate sarvapāśaiḥ

घी के ऊपर तैरने वाले अत्यंत सूक्ष्म सार के समान सब प्राणियों में छिपे शिव को, जो अकेले विश्व को घेरे हुए हैं, उस परमदेव को जानकर मनुष्य सब पाशों से मुक्त हो जाता है।

4.17

एष देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः ।
हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद् विदुरमृतास्ते भवन्ति

eṣa devo viśvakarmā mahātmā sadā janānāṃ hṛdaye sanniviṣṭaḥ |
hṛdā manīṣā manasābhiklṛpto ya etad viduramṛtāste bhavanti

यह परमदेव विश्वकर्मा हैं, महात्मा हैं और सदा प्राणियों के हृदय में स्थित हैं। वे हृदय, विवेक और मन से जाने जाते हैं। जो इसे जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं।

4.18

यदाऽतमस्तन्न दिवा न रात्रिर्न सन्नचासच्छिव एव केवलः ।
तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं प्रज्ञा च तस्मात्प्रसृता पुराणी

yadā'tamastanna divā na rātrirna sannacāsacchiva eva kevalaḥ |
tadakṣaraṃ tatsaviturvareṇyaṃ prajñā ca tasmātprasṛtā purāṇī

जब अंधकार नहीं था, तब न दिन था न रात, न सत् था न असत्; केवल शिव ही थे। वही अक्षर है, वही सविता का वरेण्य तेज है, और उन्हीं से पुरातन प्रज्ञा का प्रसार हुआ।

4.19

नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्चं न मध्ये न परिजग्रभत् ।
न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः

nainamūrdhvaṃ na tiryañcaṃ na madhye na parijagrabhat |
na tasya pratimā asti yasya nāma mahadyaśaḥ

उन्हें न ऊपर से, न तिरछे, न बीच में कोई पकड़ सका है। उनकी कोई प्रतिमा अर्थात उपमा नहीं है, जिनका नाम ही महान यश है।

4.20

न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् ।
हृदा हृदिस्थं मनसा य एनमेवं विदुरमृतास्ते भवन्ति

na saṃdṛśe tiṣṭhati rūpamasya na cakṣuṣā paśyati kaścanainam |
hṛdā hṛdisthaṃ manasā ya enamevaṃ viduramṛtāste bhavanti

उनका रूप दृष्टि के सामने नहीं ठहरता, कोई उन्हें आँखों से नहीं देखता। जो हृदय और मन से उन्हें हृदय में स्थित जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं।

4.21

अजात इत्येवं कश्चिद्भीरुः प्रपद्यते ।
रुद्र यत्ते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम्

ajāta ityevaṃ kaścidbhīruḥ prapadyate |
rudra yatte dakṣiṇaṃ mukhaṃ tena māṃ pāhi nityam

आपको अजन्मा जानकर कोई भयभीत मनुष्य आपकी शरण में आता है। हे रुद्र, आपका जो दक्षिण अर्थात कृपालु मुख है, उससे सदा मेरी रक्षा कीजिए।

4.22

मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोषु मा न अश्वेषु रीरिषः ।
वीरान् मा नो रुद्र भामितोऽवधीर्हविष्मन्तः सदामित्त्वा हवामहे

mā nastoke tanaye mā na āyuṣi mā no goṣu mā na aśveṣu rīriṣaḥ |
vīrān mā no rudra bhāmito'vadhīrhaviṣmantaḥ sadāmittvā havāmahe

हे रुद्र, हमारे पुत्रों और पौत्रों को, हमारी आयु को, हमारी गायों और घोड़ों को हानि न पहुँचाइए। क्रोध में आकर हमारे वीरों का वध न कीजिए। हवि लेकर हम सदा आपका आवाहन करते हैं।

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)