इस अध्याय में क्या होता है हाथों में आयुध लिए शूर सा कवि भार्गव पाँच जगती मन्त्र पवमान सोम को अर्पित करते हैं। द्युलोक का धारक सोम देवों की दक्षता बनकर बहता है; अश्व की भाँति छोड़ा जाकर वह नदियों में अपना बल दिखाता है। शूर की भाँति वह दोनों हाथों में आयुध लेता, गौओं को खोजता रथी बनता और इन्द्र के बल को जगाता है। उससे विनती है कि जैसे बिजली मेघों को भरती है वैसे द्यावापृथिवी को भरे। सबका राजा, मतियों का पिता, वह सूर्य की किरण से निर्मल होता है। झुण्ड की ओर वृषभ सा वह कोश में बहता है, ताकि उसकी रक्षा में स्तोता युद्ध में विजयी हों।
76.1 ध॒र्ता दि॒वः प॑वते॒ कृत्व्यो॒ रसो॒ दक्षो॑ दे॒वाना॑मनु॒माद्यो॒ नृभि॑ः । हरि॑ः सृजा॒नो अत्यो॒ न सत्व॑भि॒र्वृथा॒ पाजां॑सि कृणुते न॒दीष्वा
dhartā divaḥ pavate kṛtvyo raso dakṣo devānāmanumādyo nṛbhiḥ | hariḥ sṛjāno atyo na satvabhirvṛthā pājāṃsi kṛṇute nadīṣvā
76.2 शूरो॒ न ध॑त्त॒ आयु॑धा॒ गभ॑स्त्यो॒ः स्व१॒॑ः सिषा॑सन्रथि॒रो गवि॑ष्टिषु । इन्द्र॑स्य॒ शुष्म॑मी॒रय॑न्नप॒स्युभि॒रिन्दु॑र्हिन्वा॒नो अ॑ज्यते मनी॒षिभि॑ः
śūro na dhatta āyudhā gabhastyoḥ svaḥ siṣāsanrathiro gaviṣṭiṣu | indrasya śuṣmamīrayannapasyubhirindurhinvāno ajyate manīṣibhiḥ
76.3 इन्द्र॑स्य सोम॒ पव॑मान ऊ॒र्मिणा॑ तवि॒ष्यमा॑णो ज॒ठरे॒ष्वा वि॑श । प्र ण॑ः पिन्व वि॒द्युद॒भ्रेव॒ रोद॑सी धि॒या न वाजाँ॒ उप॑ मासि॒ शश्व॑तः
indrasya soma pavamāna ūrmiṇā taviṣyamāṇo jaṭhareṣvā viśa | pra ṇaḥ pinva vidyudabhreva rodasī dhiyā na vājām̐ upa māsi śaśvataḥ
76.4 विश्व॑स्य॒ राजा॑ पवते स्व॒र्दृश॑ ऋ॒तस्य॑ धी॒तिमृ॑षि॒षाळ॑वीवशत् । यः सूर्य॒स्यासि॑रेण मृ॒ज्यते॑ पि॒ता म॑ती॒नामस॑मष्टकाव्यः
viśvasya rājā pavate svardṛśa ṛtasya dhītimṛṣiṣāḻavīvaśat | yaḥ sūryasyāsireṇa mṛjyate pitā matīnāmasamaṣṭakāvyaḥ
76.5 वृषे॑व यू॒था परि॒ कोश॑मर्षस्य॒पामु॒पस्थे॑ वृष॒भः कनि॑क्रदत् । स इन्द्रा॑य पवसे मत्स॒रिन्त॑मो॒ यथा॒ जेषा॑म समि॒थे त्वोत॑यः
vṛṣeva yūthā pari kośamarṣasyapāmupasthe vṛṣabhaḥ kanikradat | sa indrāya pavase matsarintamo yathā jeṣāma samithe tvotayaḥ
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