नवम मण्डल

सूक्त 40: स्तोता के लिए दोनों लोकों का धन

ऋषि: बृहन्मतिराङ्गिरसः · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री

6 श्लोक · 40 में से 114

इस अध्याय में क्या होता है

स्तोता के लिए दोनों लोकों का धन

बृहन्मति आङ्गिरस का दूसरा गायत्री सूक्त। पवित्र होते हुए दूरदर्शी सोम ने सब निन्दकों पर विजय पाई है, और गायक अपनी बुद्धियों से उस प्रेरित ऋषि को सजाते हैं। अरुण वृषभ अपने आसन पर चढ़ते हैं, इन्द्र तक जाते हैं और स्थिर सदन में बैठते हैं। फिर प्रार्थनाएँ आती हैं: चारों ओर से सहस्रगुण महान धन, पवमान द्वारा लाए गए सब तेज, हज़ारों प्रकार का अन्न, स्तोता के लिए उत्तम वीरों वाला धन, और गायक की वाणियों की वृद्धि। अन्तिम मन्त्र दोनों लोकों में फैला, स्तुति के योग्य धन माँगता है।

40.1

पु॒ना॒नो अ॑क्रमीद॒भि विश्वा॒ मृधो॒ विच॑र्षणिः ।
शु॒म्भन्ति॒ विप्रं॑ धी॒तिभि॑ः

punāno akramīdabhi viśvā mṛdho vicarṣaṇiḥ |
śumbhanti vipraṃ dhītibhiḥ

40.2

आ योनि॑मरु॒णो रु॑ह॒द्गम॒दिन्द्रं॒ वृषा॑ सु॒तः ।
ध्रु॒वे सद॑सि सीदति

ā yonimaruṇo ruhadgamadindraṃ vṛṣā sutaḥ |
dhruve sadasi sīdati

40.3

नू नो॑ र॒यिं म॒हामि॑न्दो॒ऽस्मभ्यं॑ सोम वि॒श्वत॑ः ।
आ प॑वस्व सह॒स्रिण॑म्

nū no rayiṃ mahāmindo'smabhyaṃ soma viśvataḥ |
ā pavasva sahasriṇam

40.4

विश्वा॑ सोम पवमान द्यु॒म्नानी॑न्द॒वा भ॑र ।
वि॒दाः स॑ह॒स्रिणी॒रिष॑ः

viśvā soma pavamāna dyumnānīndavā bhara |
vidāḥ sahasriṇīriṣaḥ

40.5

स न॑ः पुना॒न आ भ॑र र॒यिं स्तो॒त्रे सु॒वीर्य॑म् ।
ज॒रि॒तुर्व॑र्धया॒ गिर॑ः

sa naḥ punāna ā bhara rayiṃ stotre suvīryam |
jariturvardhayā giraḥ

40.6

पु॒ना॒न इ॑न्द॒वा भ॑र॒ सोम॑ द्वि॒बर्ह॑सं र॒यिम् ।
वृष॑न्निन्दो न उ॒क्थ्य॑म्

punāna indavā bhara soma dvibarhasaṃ rayim |
vṛṣannindo na ukthyam

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)