आ॒शुर॑र्ष बृहन्मते॒ परि॑ प्रि॒येण॒ धाम्ना॑ ।
यत्र॑ दे॒वा इति॒ ब्रव॑न्
āśurarṣa bṛhanmate pari priyeṇa dhāmnā |
yatra devā iti bravan
ऋषि: बृहस्पतिराङ्गिरसः · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री
6 श्लोक · 39 में से 114
बृहन्मति आङ्गिरस गायत्री में गाते हुए सोम को 'बृहन्मते' कहकर पुकारते हैं। उनसे कहा जाता है कि वे अपने प्रिय धाम सहित शीघ्र वहाँ बहें जहाँ देव कहे जाते हैं। असंस्कृत को संस्कृत करते, लोगों को अन्न देते हुए वे द्युलोक की वर्षा बरसाएँ। निचोड़े जाकर वे ओज से तेज धारण किए, दूरदर्शी और दीप्तिमान होकर पवित्र पर आते हैं। द्युलोक के पार से वेग से चलते हुए वे नदी की लहर की भाँति पवित्र पर बह निकले। दूर और निकट निचोड़ा गया मधु इन्द्र के लिए सींचा जाता है। साथ गाते ऋत्विज पत्थरों से पिंगल सोम को प्रेरित करते हैं: ऋत की योनि में बैठो।
आ॒शुर॑र्ष बृहन्मते॒ परि॑ प्रि॒येण॒ धाम्ना॑ ।
यत्र॑ दे॒वा इति॒ ब्रव॑न्
āśurarṣa bṛhanmate pari priyeṇa dhāmnā |
yatra devā iti bravan
प॒रि॒ष्कृ॒ण्वन्ननि॑ष्कृतं॒ जना॑य या॒तय॒न्निष॑ः ।
वृ॒ष्टिं दि॒वः परि॑ स्रव
pariṣkṛṇvannaniṣkṛtaṃ janāya yātayanniṣaḥ |
vṛṣṭiṃ divaḥ pari srava
सु॒त ए॑ति प॒वित्र॒ आ त्विषिं॒ दधा॑न॒ ओज॑सा ।
वि॒चक्षा॑णो विरो॒चय॑न्
suta eti pavitra ā tviṣiṃ dadhāna ojasā |
vicakṣāṇo virocayan
अ॒यं स यो दि॒वस्परि॑ रघु॒यामा॑ प॒वित्र॒ आ ।
सिन्धो॑रू॒र्मा व्यक्ष॑रत्
ayaṃ sa yo divaspari raghuyāmā pavitra ā |
sindhorūrmā vyakṣarat
आ॒विवा॑सन्परा॒वतो॒ अथो॑ अर्वा॒वत॑ः सु॒तः ।
इन्द्रा॑य सिच्यते॒ मधु॑
āvivāsanparāvato atho arvāvataḥ sutaḥ |
indrāya sicyate madhu
स॒मी॒ची॒ना अ॑नूषत॒ हरिं॑ हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः ।
योना॑वृ॒तस्य॑ सीदत
samīcīnā anūṣata hariṃ hinvantyadribhiḥ |
yonāvṛtasya sīdata
पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)