प्र ये गावो॒ न भूर्ण॑यस्त्वे॒षा अ॒यासो॒ अक्र॑मुः ।
घ्नन्त॑ः कृ॒ष्णामप॒ त्वच॑म्
pra ye gāvo na bhūrṇayastveṣā ayāso akramuḥ |
ghnantaḥ kṛṣṇāmapa tvacam
ऋषि: मेधातिथिः काण्वः · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री
6 श्लोक · 41 में से 114
मेधातिथि काण्व गायत्री में गाते हैं। वेगवान, दीप्त बूँदें चंचल गौओं की भाँति आगे बढ़ी हैं और काली त्वचा को दूर हटाती हैं। ऋषि कल्याण तक पहुँचने के कठिन सेतु को पार करने और व्रतहीन दस्यु को जीतने की प्रार्थना करते हैं। बलवान पवमान का स्वर वर्षा के घोष जैसा सुनाई देता है, और द्युलोक में विद्युत चलती है। उनसे गौ, स्वर्ण, अश्व और बल से युक्त महान अन्न बरसाने को कहा जाता है। दूरदर्शी सोम दोनों महान लोकों को वैसे भरें जैसे उषा और सूर्य किरणों से भरते हैं। जैसे रसा नदी भूमि को घेरती है, वैसे वे शरण देने वाली धारा से हमें चारों ओर से घेरें।
प्र ये गावो॒ न भूर्ण॑यस्त्वे॒षा अ॒यासो॒ अक्र॑मुः ।
घ्नन्त॑ः कृ॒ष्णामप॒ त्वच॑म्
pra ye gāvo na bhūrṇayastveṣā ayāso akramuḥ |
ghnantaḥ kṛṣṇāmapa tvacam
सु॒वि॒तस्य॑ मनाम॒हेऽति॒ सेतुं॑ दुरा॒व्य॑म् ।
सा॒ह्वांसो॒ दस्यु॑मव्र॒तम्
suvitasya manāmahe'ti setuṃ durāvyam |
sāhvāṃso dasyumavratam
शृ॒ण्वे वृ॒ष्टेरि॑व स्व॒नः पव॑मानस्य शु॒ष्मिण॑ः ।
चर॑न्ति वि॒द्युतो॑ दि॒वि
śṛṇve vṛṣṭeriva svanaḥ pavamānasya śuṣmiṇaḥ |
caranti vidyuto divi
आ प॑वस्व म॒हीमिषं॒ गोम॑दिन्दो॒ हिर॑ण्यवत् ।
अश्वा॑व॒द्वाज॑वत्सु॒तः
ā pavasva mahīmiṣaṃ gomadindo hiraṇyavat |
aśvāvadvājavatsutaḥ
स प॑वस्व विचर्षण॒ आ म॒ही रोद॑सी पृण ।
उ॒षाः सूर्यो॒ न र॒श्मिभि॑ः
sa pavasva vicarṣaṇa ā mahī rodasī pṛṇa |
uṣāḥ sūryo na raśmibhiḥ
परि॑ णः शर्म॒यन्त्या॒ धार॑या सोम वि॒श्वत॑ः ।
सरा॑ र॒सेव॑ वि॒ष्टप॑म्
pari ṇaḥ śarmayantyā dhārayā soma viśvataḥ |
sarā raseva viṣṭapam
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