ए॒ष उ॒ स्य वृषा॒ रथोऽव्यो॒ वारे॑भिरर्षति ।
गच्छ॒न्वाजं॑ सह॒स्रिण॑म्
eṣa u sya vṛṣā ratho'vyo vārebhirarṣati |
gacchanvājaṃ sahasriṇam
ऋषि: रहूगण आङ्गिरसः · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री
6 श्लोक · 38 में से 114
रहूगण आङ्गिरस का दूसरा गायत्री सूक्त बार बार 'यह' कहकर सोम की ओर संकेत करता है। यह वृषभ, यह रथ, ऊन से होकर सहस्रगुण लाभ की ओर बहता है। त्रित की कन्याएँ पत्थरों से पिंगल इन्दु को इन्द्र के पान हेतु प्रेरित करती हैं। दस कर्मठ अँगुलियाँ उन्हें आनन्द के लिए उज्ज्वल बनाती हैं। श्येन पक्षी की भाँति वे मनुष्यों की प्रजाओं में बैठते हैं, जैसे प्रेमी अपनी प्रिया के पास जाता है। द्युलोक का यह शिशु, यह आनन्ददायी रस, ऊन में प्रवेश करते हुए नीचे देखता है। पान के लिए निचोड़े गए पिंगल सोम गरजते हुए अपने प्रिय आसन की ओर बहते हैं।
ए॒ष उ॒ स्य वृषा॒ रथोऽव्यो॒ वारे॑भिरर्षति ।
गच्छ॒न्वाजं॑ सह॒स्रिण॑म्
eṣa u sya vṛṣā ratho'vyo vārebhirarṣati |
gacchanvājaṃ sahasriṇam
ए॒तं त्रि॒तस्य॒ योष॑णो॒ हरिं॑ हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः ।
इन्दु॒मिन्द्रा॑य पी॒तये॑
etaṃ tritasya yoṣaṇo hariṃ hinvantyadribhiḥ |
indumindrāya pītaye
ए॒तं त्यं ह॒रितो॒ दश॑ मर्मृ॒ज्यन्ते॑ अप॒स्युव॑ः ।
याभि॒र्मदा॑य॒ शुम्भ॑ते
etaṃ tyaṃ harito daśa marmṛjyante apasyuvaḥ |
yābhirmadāya śumbhate
ए॒ष स्य मानु॑षी॒ष्वा श्ये॒नो न वि॒क्षु सी॑दति ।
गच्छ॑ञ्जा॒रो न यो॒षित॑म्
eṣa sya mānuṣīṣvā śyeno na vikṣu sīdati |
gacchañjāro na yoṣitam
ए॒ष स्य मद्यो॒ रसोऽव॑ चष्टे दि॒वः शिशु॑ः ।
य इन्दु॒र्वार॒मावि॑शत्
eṣa sya madyo raso'va caṣṭe divaḥ śiśuḥ |
ya indurvāramāviśat
ए॒ष स्य पी॒तये॑ सु॒तो हरि॑रर्षति धर्ण॒सिः ।
क्रन्द॒न्योनि॑म॒भि प्रि॒यम्
eṣa sya pītaye suto harirarṣati dharṇasiḥ |
krandanyonimabhi priyam
पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)