आ न॑ः पवस्व॒ धार॑या॒ पव॑मान र॒यिं पृ॒थुम् ।
यया॒ ज्योति॑र्वि॒दासि॑ नः
ā naḥ pavasva dhārayā pavamāna rayiṃ pṛthum |
yayā jyotirvidāsi naḥ
ऋषि: प्रभूवसुराङ्गिरसः · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री
6 श्लोक · 35 में से 114
प्रभूवसु आङ्गिरस गायत्री में गाते हैं। वे पवमान सोम से ऐसी धारा माँगते हैं जो विशाल धन लाए और जिससे हम ज्योति पाएँ। इन्दु से कहा जाता है कि वे समुद्र को हिलाएँ, सबको गति दें और ओज से धन धारण करें। वीर सोम के साथ हम वीरों वाले होकर आक्रमणकारियों को जीतें, और वे वरणीय धन बरसाएँ। लाभ चाहने वाले ऋषि की भाँति वे व्रतों और आयुधों को जानते हुए संग्राम की ओर बढ़ते हैं। गायक स्तुतियों से पवित्र होते सोम को, जन के गोपाल को, ढँकते हैं। सब लोग धर्म के स्वामी, प्रभूत धनवान सोम के व्रत को धारण करते हैं।
आ न॑ः पवस्व॒ धार॑या॒ पव॑मान र॒यिं पृ॒थुम् ।
यया॒ ज्योति॑र्वि॒दासि॑ नः
ā naḥ pavasva dhārayā pavamāna rayiṃ pṛthum |
yayā jyotirvidāsi naḥ
इन्दो॑ समुद्रमीङ्खय॒ पव॑स्व विश्वमेजय ।
रा॒यो ध॒र्ता न॒ ओज॑सा
indo samudramīṅkhaya pavasva viśvamejaya |
rāyo dhartā na ojasā
त्वया॑ वी॒रेण॑ वीरवो॒ऽभि ष्या॑म पृतन्य॒तः ।
क्षरा॑ णो अ॒भि वार्य॑म्
tvayā vīreṇa vīravo'bhi ṣyāma pṛtanyataḥ |
kṣarā ṇo abhi vāryam
प्र वाज॒मिन्दु॑रिष्यति॒ सिषा॑सन्वाज॒सा ऋषि॑ः ।
व्र॒ता वि॑दा॒न आयु॑धा
pra vājaminduriṣyati siṣāsanvājasā ṛṣiḥ |
vratā vidāna āyudhā
तं गी॒र्भिर्वा॑चमीङ्ख॒यं पु॑ना॒नं वा॑सयामसि ।
सोमं॒ जन॑स्य॒ गोप॑तिम्
taṃ gīrbhirvācamīṅkhayaṃ punānaṃ vāsayāmasi |
somaṃ janasya gopatim
विश्वो॒ यस्य॑ व्र॒ते जनो॑ दा॒धार॒ धर्म॑ण॒स्पते॑ः ।
पु॒ना॒नस्य॑ प्र॒भूव॑सोः
viśvo yasya vrate jano dādhāra dharmaṇaspateḥ |
punānasya prabhūvasoḥ
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