अस॑र्जि॒ रथ्यो॑ यथा प॒वित्रे॑ च॒म्वो॑ः सु॒तः ।
कार्ष्म॑न्वा॒जी न्य॑क्रमीत्
asarji rathyo yathā pavitre camvoḥ sutaḥ |
kārṣmanvājī nyakramīt
ऋषि: प्रभूवसुराङ्गिरसः · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री
6 श्लोक · 36 में से 114
प्रभूवसु आङ्गिरस का दूसरा गायत्री सूक्त। दो चमसों में निचोड़े गए सोम रथ के अश्व की भाँति पवित्र पर छोड़े जाते हैं और वह वाजी लक्ष्य पार कर जाता है। जागरूक और हवि वहन करने वाले सोम मधु टपकाते कोश की ओर बहते हैं। प्राचीन पवमान से प्रार्थना है कि वे ज्योतियों को चमकाएँ और हमें संकल्प तथा दक्षता की ओर प्रेरित करें। ऋत के पालकों से सजे, उनके हाथों से मार्जित होकर वे भेड़ के ऊन से छनते हैं। वे दाता को द्युलोक, पृथिवी और अन्तरिक्ष के सब धन दें। अश्व, गौ और वीर चाहते हुए वे द्युलोक की पीठ पर चढ़ते हैं।
अस॑र्जि॒ रथ्यो॑ यथा प॒वित्रे॑ च॒म्वो॑ः सु॒तः ।
कार्ष्म॑न्वा॒जी न्य॑क्रमीत्
asarji rathyo yathā pavitre camvoḥ sutaḥ |
kārṣmanvājī nyakramīt
स वह्नि॑ः सोम॒ जागृ॑वि॒ः पव॑स्व देव॒वीरति॑ ।
अ॒भि कोशं॑ मधु॒श्चुत॑म्
sa vahniḥ soma jāgṛviḥ pavasva devavīrati |
abhi kośaṃ madhuścutam
स नो॒ ज्योतीं॑षि पूर्व्य॒ पव॑मान॒ वि रो॑चय ।
क्रत्वे॒ दक्षा॑य नो हिनु
sa no jyotīṃṣi pūrvya pavamāna vi rocaya |
kratve dakṣāya no hinu
शु॒म्भमा॑न ऋता॒युभि॑र्मृ॒ज्यमा॑नो॒ गभ॑स्त्योः ।
पव॑ते॒ वारे॑ अ॒व्यये॑
śumbhamāna ṛtāyubhirmṛjyamāno gabhastyoḥ |
pavate vāre avyaye
स विश्वा॑ दा॒शुषे॒ वसु॒ सोमो॑ दि॒व्यानि॒ पार्थि॑वा ।
पव॑ता॒मान्तरि॑क्ष्या
sa viśvā dāśuṣe vasu somo divyāni pārthivā |
pavatāmāntarikṣyā
आ दि॒वस्पृ॒ष्ठम॑श्व॒युर्ग॑व्य॒युः सो॑म रोहसि ।
वी॒र॒युः श॑वसस्पते
ā divaspṛṣṭhamaśvayurgavyayuḥ soma rohasi |
vīrayuḥ śavasaspate
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