नवम मण्डल

सूक्त 32: त्रित की कन्याएँ पिंगल इन्दु को प्रेरित करतीं

ऋषि: श्यावाश्व आत्रेयः · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री

6 श्लोक · 32 में से 114

इस अध्याय में क्या होता है

त्रित की कन्याएँ पिंगल इन्दु को प्रेरित करतीं

श्यावाश्व आत्रेय गायत्री के छह मन्त्रों में पवमान सोम का गान करते हैं। आनन्द बरसाने वाली बूँदें यज्ञ में यजमानों की कीर्ति के लिए आगे बढ़ी हैं। त्रित की कन्याएँ पत्थरों से पिंगल इन्दु को इन्द्र के पान हेतु प्रेरित करती हैं। जैसे हंस अपने झुण्ड को पुकारता है, वैसे सोम हर उपासक की बुद्धि को जगाते हैं, और घोड़े की भाँति दूध से अभिषिक्त होते हैं। हाँके हुए मृग की तरह वे ऋत के आसन पर बैठने दौड़ते हैं, और गौएँ उन्हें प्रिय की ओर कन्या की भाँति पुकारती हैं। ऋषि यजमानों और अपने लिए दीप्त यश, लाभ, मेधा और कीर्ति माँगते हैं।

32.1

प्र सोमा॑सो मद॒च्युत॒ः श्रव॑से नो म॒घोन॑ः ।
सु॒ता वि॒दथे॑ अक्रमुः

pra somāso madacyutaḥ śravase no maghonaḥ |
sutā vidathe akramuḥ

32.2

आदीं॑ त्रि॒तस्य॒ योष॑णो॒ हरिं॑ हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः ।
इन्दु॒मिन्द्रा॑य पी॒तये॑

ādīṃ tritasya yoṣaṇo hariṃ hinvantyadribhiḥ |
indumindrāya pītaye

32.3

आदीं॑ हं॒सो यथा॑ ग॒णं विश्व॑स्यावीवशन्म॒तिम् ।
अत्यो॒ न गोभि॑रज्यते

ādīṃ haṃso yathā gaṇaṃ viśvasyāvīvaśanmatim |
atyo na gobhirajyate

32.4

उ॒भे सो॑माव॒चाक॑शन्मृ॒गो न त॒क्तो अ॑र्षसि ।
सीद॑न्नृ॒तस्य॒ योनि॒मा

ubhe somāvacākaśanmṛgo na takto arṣasi |
sīdannṛtasya yonimā

32.5

अ॒भि गावो॑ अनूषत॒ योषा॑ जा॒रमि॑व प्रि॒यम् ।
अग॑न्ना॒जिं यथा॑ हि॒तम्

abhi gāvo anūṣata yoṣā jāramiva priyam |
agannājiṃ yathā hitam

32.6

अ॒स्मे धे॑हि द्यु॒मद्यशो॑ म॒घव॑द्भ्यश्च॒ मह्यं॑ च ।
स॒निं मे॒धामु॒त श्रव॑ः

asme dhehi dyumadyaśo maghavadbhyaśca mahyaṃ ca |
saniṃ medhāmuta śravaḥ

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