नवम मण्डल

सूक्त 33: तीन वाणियाँ उठतीं, धेनुएँ रँभातीं

ऋषि: त्रित आप्त्यः · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री

6 श्लोक · 33 में से 114

इस अध्याय में क्या होता है

तीन वाणियाँ उठतीं, धेनुएँ रँभातीं

त्रित आप्त्य गायत्री छन्द में गाते हैं। ज्ञानी सोम-बिन्दु जल की लहरों की भाँति, वन की ओर जाते महिषों की भाँति बहते हैं। पिंगल और उज्ज्वल बूँदें ऋत की धारा से काठ के द्रोणों में उतरती हैं और गौओं से युक्त बल लाती हैं। इन्द्र, वायु, वरुण, मरुतों और विष्णु के लिए निचोड़ी जाकर वे आगे बहती हैं। तीन वाणियाँ उठती हैं, दुधारू गौएँ रँभाती हैं, और हरित सोम गरजते हुए आते हैं। ऋत की महान माताएँ उनकी स्तुति करती हैं और द्युलोक के शिशु को सँवारती हैं। ऋषि चारों ओर से सहस्रगुण धन के चार समुद्र माँगते हैं।

33.1

प्र सोमा॑सो विप॒श्चितो॒ऽपां न य॑न्त्यू॒र्मय॑ः ।
वना॑नि महि॒षा इ॑व

pra somāso vipaścito'pāṃ na yantyūrmayaḥ |
vanāni mahiṣā iva

33.2

अ॒भि द्रोणा॑नि ब॒भ्रव॑ः शु॒क्रा ऋ॒तस्य॒ धार॑या ।
वाजं॒ गोम॑न्तमक्षरन्

abhi droṇāni babhravaḥ śukrā ṛtasya dhārayā |
vājaṃ gomantamakṣaran

33.3

सु॒ता इन्द्रा॑य वा॒यवे॒ वरु॑णाय म॒रुद्भ्य॑ः ।
सोमा॑ अर्षन्ति॒ विष्ण॑वे

sutā indrāya vāyave varuṇāya marudbhyaḥ |
somā arṣanti viṣṇave

33.4

ति॒स्रो वाच॒ उदी॑रते॒ गावो॑ मिमन्ति धे॒नव॑ः ।
हरि॑रेति॒ कनि॑क्रदत्

tisro vāca udīrate gāvo mimanti dhenavaḥ |
harireti kanikradat

33.5

अ॒भि ब्रह्मी॑रनूषत य॒ह्वीरृ॒तस्य॑ मा॒तर॑ः ।
म॒र्मृ॒ज्यन्ते॑ दि॒वः शिशु॑म्

abhi brahmīranūṣata yahvīrṛtasya mātaraḥ |
marmṛjyante divaḥ śiśum

33.6

रा॒यः स॑मु॒द्राँश्च॒तुरो॒ऽस्मभ्यं॑ सोम वि॒श्वत॑ः ।
आ प॑वस्व सह॒स्रिण॑ः

rāyaḥ samudrām̐ścaturo'smabhyaṃ soma viśvataḥ |
ā pavasva sahasriṇaḥ

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)