ए॒ष वा॒जी हि॒तो नृभि॑र्विश्व॒विन्मन॑स॒स्पति॑ः ।
अव्यो॒ वारं॒ वि धा॑वति
eṣa vājī hito nṛbhirviśvavinmanasaspatiḥ |
avyo vāraṃ vi dhāvati
ऋषि: प्रियमेध आङ्गिरसः · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री
6 श्लोक · 28 में से 114
प्रियमेध आङ्गिरस गायत्री में पवमान सोम की स्तुति करते हैं, और मन्त्र-मन्त्र 'एष', अर्थात 'यह', से आरम्भ होता है। मनुष्यों द्वारा प्रेरित यह वेगी अश्व, सर्वज्ञ और मन का स्वामी, भेड़ की ऊन से दौड़ता है। देवों के लिए अभिषुत होकर वह छलनी में बहा है और सब धामों में प्रविष्ट हुआ है। अमर देव अपनी योनि में शोभित होता है, वृत्रों का नाशक, देवों का परम इच्छुक। दस बहनों द्वारा थामा गया गरजता वृषभ द्रोणों की ओर दौड़ता है। सब कुछ देखने वाले, सब धामों के ज्ञाता पवमान ने सूर्य को चमकाया है। बलवान, अदम्य सोम शुद्ध होकर बहता है, देवों का रक्षक और अघशंस का नाशक।
ए॒ष वा॒जी हि॒तो नृभि॑र्विश्व॒विन्मन॑स॒स्पति॑ः ।
अव्यो॒ वारं॒ वि धा॑वति
eṣa vājī hito nṛbhirviśvavinmanasaspatiḥ |
avyo vāraṃ vi dhāvati
ए॒ष प॒वित्रे॑ अक्षर॒त्सोमो॑ दे॒वेभ्य॑ः सु॒तः ।
विश्वा॒ धामा॑न्यावि॒शन्
eṣa pavitre akṣaratsomo devebhyaḥ sutaḥ |
viśvā dhāmānyāviśan
ए॒ष दे॒वः शु॑भाय॒तेऽधि॒ योना॒वम॑र्त्यः ।
वृ॒त्र॒हा दे॑व॒वीत॑मः
eṣa devaḥ śubhāyate'dhi yonāvamartyaḥ |
vṛtrahā devavītamaḥ
ए॒ष वृषा॒ कनि॑क्रदद्द॒शभि॑र्जा॒मिभि॑र्य॒तः ।
अ॒भि द्रोणा॑नि धावति
eṣa vṛṣā kanikradaddaśabhirjāmibhiryataḥ |
abhi droṇāni dhāvati
ए॒ष सूर्य॑मरोचय॒त्पव॑मानो॒ विच॑र्षणिः ।
विश्वा॒ धामा॑नि विश्व॒वित्
eṣa sūryamarocayatpavamāno vicarṣaṇiḥ |
viśvā dhāmāni viśvavit
ए॒ष शु॒ष्म्यदा॑भ्य॒ः सोम॑ः पुना॒नो अ॑र्षति ।
दे॒वा॒वीर॑घशंस॒हा
eṣa śuṣmyadābhyaḥ somaḥ punāno arṣati |
devāvīraghaśaṃsahā
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