प्रास्य॒ धारा॑ अक्षर॒न्वृष्ण॑ः सु॒तस्यौज॑सा ।
दे॒वाँ अनु॑ प्र॒भूष॑तः
prāsya dhārā akṣaranvṛṣṇaḥ sutasyaujasā |
devām̐ anu prabhūṣataḥ
ऋषि: नृमेध आङ्गिरसः · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री
6 श्लोक · 29 में से 114
नृमेध आङ्गिरस गायत्री में पवमान सोम को सम्बोधित करते हैं। अभिषुत वृषभ की धाराएँ ओज के साथ बही हैं, देवों की सेवा में। स्तुति करते विधाता उस वेगी अश्व को गीत से सँवारते हैं, जो उत्पन्न होती ज्योति है, उक्थों के योग्य। धनवान सोम से स्तुत्य समुद्र को बढ़ाने की प्रार्थना है। सब धन जीतता हुआ वह धारा में बहे और द्वेषियों को एक साथ दूर करे। उससे अदानी से और किसी की भी वाणी से रक्षा माँगी जाती है, जिससे स्तोता निन्दा से मुक्त हों। अन्तिम मन्त्र पार्थिव और दिव्य धन तथा तेजस्वी बल माँगता है।
प्रास्य॒ धारा॑ अक्षर॒न्वृष्ण॑ः सु॒तस्यौज॑सा ।
दे॒वाँ अनु॑ प्र॒भूष॑तः
prāsya dhārā akṣaranvṛṣṇaḥ sutasyaujasā |
devām̐ anu prabhūṣataḥ
सप्तिं॑ मृजन्ति वे॒धसो॑ गृ॒णन्त॑ः का॒रवो॑ गि॒रा ।
ज्योति॑र्जज्ञा॒नमु॒क्थ्य॑म्
saptiṃ mṛjanti vedhaso gṛṇantaḥ kāravo girā |
jyotirjajñānamukthyam
सु॒षहा॑ सोम॒ तानि॑ ते पुना॒नाय॑ प्रभूवसो ।
वर्धा॑ समु॒द्रमु॒क्थ्य॑म्
suṣahā soma tāni te punānāya prabhūvaso |
vardhā samudramukthyam
विश्वा॒ वसू॑नि सं॒जय॒न्पव॑स्व सोम॒ धार॑या ।
इ॒नु द्वेषां॑सि स॒ध्र्य॑क्
viśvā vasūni saṃjayanpavasva soma dhārayā |
inu dveṣāṃsi sadhryak
रक्षा॒ सु नो॒ अर॑रुषः स्व॒नात्स॑मस्य॒ कस्य॑ चित् ।
नि॒दो यत्र॑ मुमु॒च्महे॑
rakṣā su no araruṣaḥ svanātsamasya kasya cit |
nido yatra mumucmahe
एन्दो॒ पार्थि॑वं र॒यिं दि॒व्यं प॑वस्व॒ धार॑या ।
द्यु॒मन्तं॒ शुष्म॒मा भ॑र
endo pārthivaṃ rayiṃ divyaṃ pavasva dhārayā |
dyumantaṃ śuṣmamā bhara
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