ए॒ष क॒विर॒भिष्टु॑तः प॒वित्रे॒ अधि॑ तोशते ।
पु॒ना॒नो घ्नन्नप॒ स्रिध॑ः
eṣa kavirabhiṣṭutaḥ pavitre adhi tośate |
punāno ghnannapa sridhaḥ
ऋषि: नृमेध आङ्गिरसः · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री
6 श्लोक · 27 में से 114
नृमेध आङ्गिरस गायत्री में पवमान सोम का गान करते हैं, और हर मन्त्र 'एष', अर्थात 'यह', से आरम्भ होता है। यह स्तुत कवि छलनी में प्रेरित होता है, शुद्ध होता हुआ और शत्रुओं को मारता हुआ। स्वर्लोक को जीतने वाला, दक्षता देने वाला वह इन्द्र और वायु के लिए सींचा जाता है। अभिषुत वृषभ, द्युलोक का शीर्ष, मनुष्यों द्वारा ले जाया जाता है, काष्ठ पात्रों में सर्वज्ञ सोम। गौओं और स्वर्ण का इच्छुक, सब कुछ जीतने वाला अजेय इन्दु गरजा है। वह सूर्य के साथ द्युलोक में होड़ करता है, छलनी में आनन्द देने वाला हर्ष। बलवान हरित वृषभ अन्तरिक्ष में दौड़ा है, शुद्ध इन्दु इन्द्र की ओर जाता हुआ।
ए॒ष क॒विर॒भिष्टु॑तः प॒वित्रे॒ अधि॑ तोशते ।
पु॒ना॒नो घ्नन्नप॒ स्रिध॑ः
eṣa kavirabhiṣṭutaḥ pavitre adhi tośate |
punāno ghnannapa sridhaḥ
ए॒ष इन्द्रा॑य वा॒यवे॑ स्व॒र्जित्परि॑ षिच्यते ।
प॒वित्रे॑ दक्ष॒साध॑नः
eṣa indrāya vāyave svarjitpari ṣicyate |
pavitre dakṣasādhanaḥ
ए॒ष नृभि॒र्वि नी॑यते दि॒वो मू॒र्धा वृषा॑ सु॒तः ।
सोमो॒ वने॑षु विश्व॒वित्
eṣa nṛbhirvi nīyate divo mūrdhā vṛṣā sutaḥ |
somo vaneṣu viśvavit
ए॒ष ग॒व्युर॑चिक्रद॒त्पव॑मानो हिरण्य॒युः ।
इन्दु॑ः सत्रा॒जिदस्तृ॑तः
eṣa gavyuracikradatpavamāno hiraṇyayuḥ |
induḥ satrājidastṛtaḥ
ए॒ष सूर्ये॑ण हासते॒ पव॑मानो॒ अधि॒ द्यवि॑ ।
प॒वित्रे॑ मत्स॒रो मद॑ः
eṣa sūryeṇa hāsate pavamāno adhi dyavi |
pavitre matsaro madaḥ
ए॒ष शु॒ष्म्य॑सिष्यदद॒न्तरि॑क्षे॒ वृषा॒ हरि॑ः ।
पु॒ना॒न इन्दु॒रिन्द्र॒मा
eṣa śuṣmyasiṣyadadantarikṣe vṛṣā hariḥ |
punāna indurindramā
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