नवम मण्डल

सूक्त 26: अदिति की गोद में सँवारा गया

ऋषि: इध्मवाहो दार्ढच्युतः · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री

6 श्लोक · 26 में से 114

इस अध्याय में क्या होता है

अदिति की गोद में सँवारा गया

इध्मवाह दार्ढच्युत गायत्री में पवमान सोम की स्तुति करते हैं, और हर मन्त्र 'तम्', अर्थात 'उसे', से आरम्भ होता है। विप्रों ने सूक्ष्म धी से अदिति की गोद में उस वेगी अश्व को सँवारा। गौएँ उस सहस्र धाराओं वाले, अक्षय, द्युलोक के धारक इन्दु की ओर रँभाईं। मेधा से उन्होंने द्युलोक में विधाता पवमान को प्रेरित किया, जो अनेकों का पोषक धारक है। दोनों भुजाओं की धी से उन्होंने विवस्वान द्वारा ओढ़ाए गए, वाणी के अदम्य स्वामी को प्रेरित किया। शिखर पर बहनें उस हरित, मनोहर, बहुदर्शी को पत्थरों से प्रेरित करती हैं। ऋत्विज गीत से बढ़े पवमान को इन्द्र के लिए हर्षदायी इन्दु के रूप में प्रेरित करते हैं।

26.1

तम॑मृक्षन्त वा॒जिन॑मु॒पस्थे॒ अदि॑ते॒रधि॑ ।
विप्रा॑सो॒ अण्व्या॑ धि॒या

tamamṛkṣanta vājinamupasthe aditeradhi |
viprāso aṇvyā dhiyā

26.2

तं गावो॑ अ॒भ्य॑नूषत स॒हस्र॑धार॒मक्षि॑तम् ।
इन्दुं॑ ध॒र्तार॒मा दि॒वः

taṃ gāvo abhyanūṣata sahasradhāramakṣitam |
induṃ dhartāramā divaḥ

26.3

तं वे॒धां मे॒धया॑ह्य॒न्पव॑मान॒मधि॒ द्यवि॑ ।
ध॒र्ण॒सिं भूरि॑धायसम्

taṃ vedhāṃ medhayāhyanpavamānamadhi dyavi |
dharṇasiṃ bhūridhāyasam

26.4

तम॑ह्यन्भु॒रिजो॑र्धि॒या सं॒वसा॑नं वि॒वस्व॑तः ।
पतिं॑ वा॒चो अदा॑भ्यम्

tamahyanbhurijordhiyā saṃvasānaṃ vivasvataḥ |
patiṃ vāco adābhyam

26.5

तं साना॒वधि॑ जा॒मयो॒ हरिं॑ हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः ।
ह॒र्य॒तं भूरि॑चक्षसम्

taṃ sānāvadhi jāmayo hariṃ hinvantyadribhiḥ |
haryataṃ bhūricakṣasam

26.6

तं त्वा॑ हिन्वन्ति वे॒धस॒ः पव॑मान गिरा॒वृध॑म् ।
इन्द॒विन्द्रा॑य मत्स॒रम्

taṃ tvā hinvanti vedhasaḥ pavamāna girāvṛdham |
indavindrāya matsaram

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