नवम मण्डल

सूक्त 17: तीनों दीप्त लोकों के पार चढ़ता सोम

ऋषि: कश्यपोऽसितो देवलो वा · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री

8 श्लोक · 17 में से 114

इस अध्याय में क्या होता है

तीनों दीप्त लोकों के पार चढ़ता सोम

कश्यप असित अथवा देवल गायत्री में पवमान सोम की स्तुति करते हैं। ढलान पर दौड़ती नदियों की भाँति वेगवान सोम छोड़े जाते हैं। पृथ्वी पर वर्षा की भाँति अभिषुत बिन्दु इन्द्र की ओर बहते हैं। हर्ष से उमड़ता सोम छलनी में बहता है, राक्षसों को मारता हुआ। वह कलशों में दौड़ता है, छलनी में सींचा जाता है और यज्ञों में उक्थों से बढ़ता है। तीनों दीप्त लोकों के पार चढ़कर वह द्युलोक में चमकता है और सूर्य को गति देता है। यज्ञ के शिखर पर विप्र अपनी धीतियों से उस अश्व को सँवारते हैं। उससे मधु की धारा में बहने की प्रार्थना है।

17.1

प्र नि॒म्नेने॑व॒ सिन्ध॑वो॒ घ्नन्तो॑ वृ॒त्राणि॒ भूर्ण॑यः ।
सोमा॑ असृग्रमा॒शव॑ः

pra nimneneva sindhavo ghnanto vṛtrāṇi bhūrṇayaḥ |
somā asṛgramāśavaḥ

17.2

अ॒भि सु॑वा॒नास॒ इन्द॑वो वृ॒ष्टय॑ः पृथि॒वीमि॑व ।
इन्द्रं॒ सोमा॑सो अक्षरन्

abhi suvānāsa indavo vṛṣṭayaḥ pṛthivīmiva |
indraṃ somāso akṣaran

17.3

अत्यू॑र्मिर्मत्स॒रो मद॒ः सोम॑ः प॒वित्रे॑ अर्षति ।
वि॒घ्नन्रक्षां॑सि देव॒युः

atyūrmirmatsaro madaḥ somaḥ pavitre arṣati |
vighnanrakṣāṃsi devayuḥ

17.4

आ क॒लशे॑षु धावति प॒वित्रे॒ परि॑ षिच्यते ।
उ॒क्थैर्य॒ज्ञेषु॑ वर्धते

ā kalaśeṣu dhāvati pavitre pari ṣicyate |
ukthairyajñeṣu vardhate

17.5

अति॒ त्री सो॑म रोच॒ना रोह॒न्न भ्रा॑जसे॒ दिव॑म् ।
इ॒ष्णन्सूर्यं॒ न चो॑दयः

ati trī soma rocanā rohanna bhrājase divam |
iṣṇansūryaṃ na codayaḥ

17.6

अ॒भि विप्रा॑ अनूषत मू॒र्धन्य॒ज्ञस्य॑ का॒रव॑ः ।
दधा॑ना॒श्चक्ष॑सि प्रि॒यम्

abhi viprā anūṣata mūrdhanyajñasya kāravaḥ |
dadhānāścakṣasi priyam

17.7

तमु॑ त्वा वा॒जिनं॒ नरो॑ धी॒भिर्विप्रा॑ अव॒स्यव॑ः ।
मृ॒जन्ति॑ दे॒वता॑तये

tamu tvā vājinaṃ naro dhībhirviprā avasyavaḥ |
mṛjanti devatātaye

17.8

मधो॒र्धारा॒मनु॑ क्षर ती॒व्रः स॒धस्थ॒मास॑दः ।
चारु॑रृ॒ताय॑ पी॒तये॑

madhordhārāmanu kṣara tīvraḥ sadhasthamāsadaḥ |
cārurṛtāya pītaye

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