नवम मण्डल

सूक्त 18: हर्ष में तुम सर्वदाता हो

ऋषि: कश्यपोऽसितो देवलो वा · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री

7 श्लोक · 18 में से 114

इस अध्याय में क्या होता है

हर्ष में तुम सर्वदाता हो

कश्यप असित अथवा देवल गायत्री में पवमान सोम को सम्बोधित करते हैं, और हर मन्त्र 'मदेषु सर्वधा असि' पर समाप्त होता है, अर्थात 'अपने हर्ष में तुम सब कुछ देने वाले हो'। पर्वत पर रहने वाला सोम अभिषुत होकर छलनी में बहा है। वह विप्र है, कवि है, ओषधि से उत्पन्न मधु है। सब देवों ने एकमत होकर उसका पान पाया है। वह सब वरणीय धन अपने दोनों हाथों में रखता है। वह महान द्यावापृथिवी को दो माताओं की भाँति दुहता है, और बल के साथ तुरन्त दोनों लोकों के चारों ओर बहता है। कलशों में शुद्ध होकर वह बलवान गरजा है।

18.1

परि॑ सुवा॒नो गि॑रि॒ष्ठाः प॒वित्रे॒ सोमो॑ अक्षाः ।
मदे॑षु सर्व॒धा अ॑सि

pari suvāno giriṣṭhāḥ pavitre somo akṣāḥ |
madeṣu sarvadhā asi

18.2

त्वं विप्र॒स्त्वं क॒विर्मधु॒ प्र जा॒तमन्ध॑सः ।
मदे॑षु सर्व॒धा अ॑सि

tvaṃ viprastvaṃ kavirmadhu pra jātamandhasaḥ |
madeṣu sarvadhā asi

18.3

तव॒ विश्वे॑ स॒जोष॑सो दे॒वास॑ः पी॒तिमा॑शत ।
मदे॑षु सर्व॒धा अ॑सि

tava viśve sajoṣaso devāsaḥ pītimāśata |
madeṣu sarvadhā asi

18.4

आ यो विश्वा॑नि॒ वार्या॒ वसू॑नि॒ हस्त॑योर्द॒धे ।
मदे॑षु सर्व॒धा अ॑सि

ā yo viśvāni vāryā vasūni hastayordadhe |
madeṣu sarvadhā asi

18.5

य इ॒मे रोद॑सी म॒ही सं मा॒तरे॑व॒ दोह॑ते ।
मदे॑षु सर्व॒धा अ॑सि

ya ime rodasī mahī saṃ mātareva dohate |
madeṣu sarvadhā asi

18.6

परि॒ यो रोद॑सी उ॒भे स॒द्यो वाजे॑भि॒रर्ष॑ति ।
मदे॑षु सर्व॒धा अ॑सि

pari yo rodasī ubhe sadyo vājebhirarṣati |
madeṣu sarvadhā asi

18.7

स शु॒ष्मी क॒लशे॒ष्वा पु॑ना॒नो अ॑चिक्रदत् ।
मदे॑षु सर्व॒धा अ॑सि

sa śuṣmī kalaśeṣvā punāno acikradat |
madeṣu sarvadhā asi

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)