प्र ते॑ सो॒तार॑ ओ॒ण्यो॒३॒॑ रसं॒ मदा॑य॒ घृष्व॑ये ।
सर्गो॒ न त॒क्त्येत॑शः
pra te sotāra oṇyo rasaṃ madāya ghṛṣvaye |
sargo na taktyetaśaḥ
ऋषि: कश्यपोऽसितो देवलो वा · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री
8 श्लोक · 16 में से 114
कश्यप असित अथवा देवल गायत्री में पवमान सोम को सम्बोधित करते हैं। अभिषव करने वाले रस को प्रबल हर्ष के लिए छोड़ते हैं, छूटे हुए अश्व की भाँति वेगवान। जलों को ओढ़े, गौओं को जीतने वाले सोम को अंशुओं में खोजा जाता है। ऋत्विजों से कहा जाता है कि दुर्लंघ्य सोम को छलनी में डालकर इन्द्र के पान के लिए शुद्ध करें। नमस्कारों के साथ बिन्दु महान संग्राम के लिए इन्द्र की ओर छोड़े जाते हैं। ऊनी रूप में शुद्ध होकर वह सब शोभाओं के बीच ऐसे खड़ा होता है जैसे गौओं के बीच शूर। धारा द्युलोक के शिखर-सी उमड़ती है और सोम भेड़ की ऊन के पार दौड़ता है।
प्र ते॑ सो॒तार॑ ओ॒ण्यो॒३॒॑ रसं॒ मदा॑य॒ घृष्व॑ये ।
सर्गो॒ न त॒क्त्येत॑शः
pra te sotāra oṇyo rasaṃ madāya ghṛṣvaye |
sargo na taktyetaśaḥ
क्रत्वा॒ दक्ष॑स्य र॒थ्य॑म॒पो वसा॑न॒मन्ध॑सा ।
गो॒षामण्वे॑षु सश्चिम
kratvā dakṣasya rathyamapo vasānamandhasā |
goṣāmaṇveṣu saścima
अन॑प्तम॒प्सु दु॒ष्टरं॒ सोमं॑ प॒वित्र॒ आ सृ॑ज ।
पु॒नी॒हीन्द्रा॑य॒ पात॑वे
anaptamapsu duṣṭaraṃ somaṃ pavitra ā sṛja |
punīhīndrāya pātave
प्र पु॑ना॒नस्य॒ चेत॑सा॒ सोम॑ः प॒वित्रे॑ अर्षति ।
क्रत्वा॑ स॒धस्थ॒मास॑दत्
pra punānasya cetasā somaḥ pavitre arṣati |
kratvā sadhasthamāsadat
प्र त्वा॒ नमो॑भि॒रिन्द॑व॒ इन्द्र॒ सोमा॑ असृक्षत ।
म॒हे भरा॑य का॒रिण॑ः
pra tvā namobhirindava indra somā asṛkṣata |
mahe bharāya kāriṇaḥ
पु॒ना॒नो रू॒पे अ॒व्यये॒ विश्वा॒ अर्ष॑न्न॒भि श्रिय॑ः ।
शूरो॒ न गोषु॑ तिष्ठति
punāno rūpe avyaye viśvā arṣannabhi śriyaḥ |
śūro na goṣu tiṣṭhati
दि॒वो न सानु॑ पि॒प्युषी॒ धारा॑ सु॒तस्य॑ वे॒धस॑ः ।
वृथा॑ प॒वित्रे॑ अर्षति
divo na sānu pipyuṣī dhārā sutasya vedhasaḥ |
vṛthā pavitre arṣati
त्वं सो॑म विप॒श्चितं॒ तना॑ पुना॒न आ॒युषु॑ ।
अव्यो॒ वारं॒ वि धा॑वसि
tvaṃ soma vipaścitaṃ tanā punāna āyuṣu |
avyo vāraṃ vi dhāvasi
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