नवम मण्डल

सूक्त 15: यूथ का वृषभ सींग हिलाता है

ऋषि: कश्यपोऽसितो देवलो वा · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री

8 श्लोक · 15 में से 114

इस अध्याय में क्या होता है

यूथ का वृषभ सींग हिलाता है

कश्यप असित अथवा देवल गायत्री में पवमान सोम का गान करते हैं, और हर मन्त्र 'एष' या 'एतम्', अर्थात 'यह', से आरम्भ होता है। यह शूर वेगवान रथों के साथ इन्द्र के संगम-स्थान की ओर जाता है। वह उज्ज्वल मार्ग से ले जाया जाता है। यूथ के वृषभ की भाँति वह सींग हिलाता और पैने करता है। चमकती अंशुओं के साथ वह नदियों का स्वामी बनता है, और कठिन स्थानों को लाँघकर घास भरी भूमि तक उतरता है। मनुष्य उसे द्रोणों में सँवारते हैं; दस उँगलियाँ और सात धीतियाँ उस सुन्दर आयुधों वाले, परम आनन्ददायी को सँवारती हैं।

15.1

ए॒ष धि॒या या॒त्यण्व्या॒ शूरो॒ रथे॑भिरा॒शुभि॑ः ।
गच्छ॒न्निन्द्र॑स्य निष्कृ॒तम्

eṣa dhiyā yātyaṇvyā śūro rathebhirāśubhiḥ |
gacchannindrasya niṣkṛtam

15.2

ए॒ष पु॒रू धि॑यायते बृह॒ते दे॒वता॑तये ।
यत्रा॒मृता॑स॒ आस॑ते

eṣa purū dhiyāyate bṛhate devatātaye |
yatrāmṛtāsa āsate

15.3

ए॒ष हि॒तो वि नी॑यते॒ऽन्तः शु॒भ्राव॑ता प॒था ।
यदी॑ तु॒ञ्जन्ति॒ भूर्ण॑यः

eṣa hito vi nīyate'ntaḥ śubhrāvatā pathā |
yadī tuñjanti bhūrṇayaḥ

15.4

ए॒ष शृङ्गा॑णि॒ दोधु॑व॒च्छिशी॑ते यू॒थ्यो॒३॒॑ वृषा॑ ।
नृ॒म्णा दधा॑न॒ ओज॑सा

eṣa śṛṅgāṇi dodhuvacchiśīte yūthyo vṛṣā |
nṛmṇā dadhāna ojasā

15.5

ए॒ष रु॒क्मिभि॑रीयते वा॒जी शु॒भ्रेभि॑रं॒शुभि॑ः ।
पति॒ः सिन्धू॑नां॒ भव॑न्

eṣa rukmibhirīyate vājī śubhrebhiraṃśubhiḥ |
patiḥ sindhūnāṃ bhavan

15.6

ए॒ष वसू॑नि पिब्द॒ना परु॑षा ययि॒वाँ अति॑ ।
अव॒ शादे॑षु गच्छति

eṣa vasūni pibdanā paruṣā yayivām̐ ati |
ava śādeṣu gacchati

15.7

ए॒तं मृ॑जन्ति॒ मर्ज्य॒मुप॒ द्रोणे॑ष्वा॒यव॑ः ।
प्र॒च॒क्रा॒णं म॒हीरिष॑ः

etaṃ mṛjanti marjyamupa droṇeṣvāyavaḥ |
pracakrāṇaṃ mahīriṣaḥ

15.8

ए॒तमु॒ त्यं दश॒ क्षिपो॑ मृ॒जन्ति॑ स॒प्त धी॒तय॑ः ।
स्वा॒यु॒धं म॒दिन्त॑मम्

etamu tyaṃ daśa kṣipo mṛjanti sapta dhītayaḥ |
svāyudhaṃ madintamam

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