नवम मण्डल

सूक्त 14: पाँच जन सँवारते हैं बहते कवि को

ऋषि: कश्यपोऽसितो देवलो वा · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री

8 श्लोक · 14 में से 114

इस अध्याय में क्या होता है

पाँच जन सँवारते हैं बहते कवि को

कश्यप असित अथवा देवल गायत्री में पवमान सोम की स्तुति करते हैं। नदी की लहर पर आश्रित कवि आगे बहा है, बहुवांछित गीत लिए। बन्धु-से पाँच जन उस धारक को गीत से सँवारते हैं। जब वह दूध से ढका जाता है, तब सब देव रस में आनन्दित होते हैं। छूटकर वह दौड़ता है और शरीर के छिलके पीछे छोड़ देता है। विवस्वान की पौत्रियाँ उसे उजले युवक की भाँति सँवारती हैं, और वह दूध को वस्त्र बनाता है। उँगलियाँ अन्न के स्वामी को मलती हैं और अश्व की पीठ थामती हैं। सोम से प्रार्थना है कि वह द्युलोक और पृथ्वी की सब सम्पदा लेकर आए।

14.1

परि॒ प्रासि॑ष्यदत्क॒विः सिन्धो॑रू॒र्मावधि॑ श्रि॒तः ।
का॒रं बिभ्र॑त्पुरु॒स्पृह॑म्

pari prāsiṣyadatkaviḥ sindhorūrmāvadhi śritaḥ |
kāraṃ bibhratpuruspṛham

14.2

गि॒रा यदी॒ सब॑न्धव॒ः पञ्च॒ व्राता॑ अप॒स्यव॑ः ।
प॒रि॒ष्कृ॒ण्वन्ति॑ धर्ण॒सिम्

girā yadī sabandhavaḥ pañca vrātā apasyavaḥ |
pariṣkṛṇvanti dharṇasim

14.3

आद॑स्य शु॒ष्मिणो॒ रसे॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॑मत्सत ।
यदी॒ गोभि॑र्वसा॒यते॑

ādasya śuṣmiṇo rase viśve devā amatsata |
yadī gobhirvasāyate

14.4

नि॒रि॒णा॒नो वि धा॑वति॒ जह॒च्छर्या॑णि॒ तान्वा॑ ।
अत्रा॒ सं जि॑घ्नते यु॒जा

niriṇāno vi dhāvati jahaccharyāṇi tānvā |
atrā saṃ jighnate yujā

14.5

न॒प्तीभि॒र्यो वि॒वस्व॑तः शु॒भ्रो न मा॑मृ॒जे युवा॑ ।
गाः कृ॑ण्वा॒नो न नि॒र्णिज॑म्

naptībhiryo vivasvataḥ śubhro na māmṛje yuvā |
gāḥ kṛṇvāno na nirṇijam

14.6

अति॑ श्रि॒ती ति॑र॒श्चता॑ ग॒व्या जि॑गा॒त्यण्व्या॑ ।
व॒ग्नुमि॑यर्ति॒ यं वि॒दे

ati śritī tiraścatā gavyā jigātyaṇvyā |
vagnumiyarti yaṃ vide

14.7

अ॒भि क्षिप॒ः सम॑ग्मत म॒र्जय॑न्तीरि॒षस्पति॑म् ।
पृ॒ष्ठा गृ॑भ्णत वा॒जिन॑ः

abhi kṣipaḥ samagmata marjayantīriṣaspatim |
pṛṣṭhā gṛbhṇata vājinaḥ

14.8

परि॑ दि॒व्यानि॒ मर्मृ॑श॒द्विश्वा॑नि सोम॒ पार्थि॑वा ।
वसू॑नि याह्यस्म॒युः

pari divyāni marmṛśadviśvāni soma pārthivā |
vasūni yāhyasmayuḥ

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