नवम मण्डल

सूक्त 10: रथों और धावकों के समान सोम

ऋषि: कश्यपोऽसितो देवलो वा · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री

9 श्लोक · 10 में से 114

इस अध्याय में क्या होता है

रथों और धावकों के समान सोम

कश्यप असित अथवा देवल गायत्री में पवमान सोम का गान उपमाओं की लड़ी में करते हैं। अभिषुत सोम रथों की भाँति और यश के इच्छुक अश्वों की भाँति धन की ओर बढ़ते हैं। वे दोनों हाथों में ऐसे थामे जाते हैं जैसे श्रमिक भार उठाते हैं। राजाओं की भाँति वे दूध से अभिषिक्त होते हैं, जैसे सात ऋत्विजों से यज्ञ सजता है। विवस्वान द्वारा पिए गए वे उषा का सौभाग्य उत्पन्न करते हैं, और कारु बुद्धि के द्वार खोलते हैं। सात बन्धु होता साथ बैठकर एक ही पद को भरते हैं। सूर्य-रूप सोम द्युलोक के उस प्रिय पद को देखता है जिसे अध्वर्युओं ने गुहा में रखा है।

10.1

प्र स्वा॒नासो॒ रथा॑ इ॒वार्व॑न्तो॒ न श्र॑व॒स्यव॑ः ।
सोमा॑सो रा॒ये अ॑क्रमुः

pra svānāso rathā ivārvanto na śravasyavaḥ |
somāso rāye akramuḥ

10.2

हि॒न्वा॒नासो॒ रथा॑ इव दधन्वि॒रे गभ॑स्त्योः ।
भरा॑सः का॒रिणा॑मिव

hinvānāso rathā iva dadhanvire gabhastyoḥ |
bharāsaḥ kāriṇāmiva

10.3

राजा॑नो॒ न प्रश॑स्तिभि॒ः सोमा॑सो॒ गोभि॑रञ्जते ।
य॒ज्ञो न स॒प्त धा॒तृभि॑ः

rājāno na praśastibhiḥ somāso gobhirañjate |
yajño na sapta dhātṛbhiḥ

10.4

परि॑ सुवा॒नास॒ इन्द॑वो॒ मदा॑य ब॒र्हणा॑ गि॒रा ।
सु॒ता अ॑र्षन्ति॒ धार॑या

pari suvānāsa indavo madāya barhaṇā girā |
sutā arṣanti dhārayā

10.5

आ॒पा॒नासो॑ वि॒वस्व॑तो॒ जन॑न्त उ॒षसो॒ भग॑म् ।
सूरा॒ अण्वं॒ वि त॑न्वते

āpānāso vivasvato jananta uṣaso bhagam |
sūrā aṇvaṃ vi tanvate

10.6

अप॒ द्वारा॑ मती॒नां प्र॒त्ना ऋ॑ण्वन्ति का॒रव॑ः ।
वृष्णो॒ हर॑स आ॒यव॑ः

apa dvārā matīnāṃ pratnā ṛṇvanti kāravaḥ |
vṛṣṇo harasa āyavaḥ

10.7

स॒मी॒ची॒नास॑ आसते॒ होता॑रः स॒प्तजा॑मयः ।
प॒दमेक॑स्य॒ पिप्र॑तः

samīcīnāsa āsate hotāraḥ saptajāmayaḥ |
padamekasya piprataḥ

10.8

नाभा॒ नाभिं॑ न॒ आ द॑दे॒ चक्षु॑श्चि॒त्सूर्ये॒ सचा॑ ।
क॒वेरप॑त्य॒मा दु॑हे

nābhā nābhiṃ na ā dade cakṣuścitsūrye sacā |
kaverapatyamā duhe

10.9

अ॒भि प्रि॒या दि॒वस्प॒दम॑ध्व॒र्युभि॒र्गुहा॑ हि॒तम् ।
सूर॑ः पश्यति॒ चक्ष॑सा

abhi priyā divaspadamadhvaryubhirguhā hitam |
sūraḥ paśyati cakṣasā

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