अष्टम मण्डल

सूक्त 76: मरुतों के सखा इन्द्र सोम पीते हैं

ऋषि: कुरुसुतिः काण्वः · देवता: इन्द्रः · छन्द: गायत्री

12 श्लोक · 76 में से 103

इस अध्याय में क्या होता है

मरुतों के सखा इन्द्र सोम पीते हैं

कुरुसुति काण्व अपने बल से स्वामी इन्द्र को मरुतों के साथ पुकारते हैं। मरुतों को सखा बनाकर इन्द्र ने सौ पर्वों वाले वज्र से वृत्र का सिर फोड़ा और समुद्र के जल मुक्त किए। उन्हीं के साथ उन्होंने स्वर्ग का प्रकाश जीता। ऋषि बार बार मरुत्वान् इन्द्र को निचोड़ा हुआ सोम पीने बुलाते हैं, जब वे अपने ओज से वज्र को तेज़ करते हैं। पीकर उठते हुए इन्द्र ने अपने जबड़े हिलाए, और जब वे दस्यु के संहारक बने तब दोनों लोक उनके आगे झुक गए। अन्तिम मन्त्र में ऋषि कहते हैं कि उन्होंने इन्द्र से आठ पदों वाली, नौ कोनों वाली, ऋत को छूने वाली वाणी रची है।

76.1

इ॒मं नु मा॒यिनं॑ हुव॒ इन्द्र॒मीशा॑न॒मोज॑सा ।
म॒रुत्व॑न्तं॒ न वृ॒ञ्जसे॑

imaṃ nu māyinaṃ huva indramīśānamojasā |
marutvantaṃ na vṛñjase

76.2

अ॒यमिन्द्रो॑ म॒रुत्स॑खा॒ वि वृ॒त्रस्या॑भिन॒च्छिर॑ः ।
वज्रे॑ण श॒तप॑र्वणा

ayamindro marutsakhā vi vṛtrasyābhinacchiraḥ |
vajreṇa śataparvaṇā

76.3

वा॒वृ॒धा॒नो म॒रुत्स॒खेन्द्रो॒ वि वृ॒त्रमै॑रयत् ।
सृ॒जन्स॑मु॒द्रिया॑ अ॒पः

vāvṛdhāno marutsakhendro vi vṛtramairayat |
sṛjansamudriyā apaḥ

76.4

अ॒यं ह॒ येन॒ वा इ॒दं स्व॑र्म॒रुत्व॑ता जि॒तम् ।
इन्द्रे॑ण॒ सोम॑पीतये

ayaṃ ha yena vā idaṃ svarmarutvatā jitam |
indreṇa somapītaye

76.5

म॒रुत्व॑न्तमृजी॒षिण॒मोज॑स्वन्तं विर॒प्शिन॑म् ।
इन्द्रं॑ गी॒र्भिर्ह॑वामहे

marutvantamṛjīṣiṇamojasvantaṃ virapśinam |
indraṃ gīrbhirhavāmahe

76.6

इन्द्रं॑ प्र॒त्नेन॒ मन्म॑ना म॒रुत्व॑न्तं हवामहे ।
अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये॑

indraṃ pratnena manmanā marutvantaṃ havāmahe |
asya somasya pītaye

76.7

म॒रुत्वाँ॑ इन्द्र मीढ्व॒ः पिबा॒ सोमं॑ शतक्रतो ।
अ॒स्मिन्य॒ज्ञे पु॑रुष्टुत

marutvām̐ indra mīḍhvaḥ pibā somaṃ śatakrato |
asminyajñe puruṣṭuta

76.8

तुभ्येदि॑न्द्र म॒रुत्व॑ते सु॒ताः सोमा॑सो अद्रिवः ।
हृ॒दा हू॑यन्त उ॒क्थिन॑ः

tubhyedindra marutvate sutāḥ somāso adrivaḥ |
hṛdā hūyanta ukthinaḥ

76.9

पिबेदि॑न्द्र म॒रुत्स॑खा सु॒तं सोमं॒ दिवि॑ष्टिषु ।
वज्रं॒ शिशा॑न॒ ओज॑सा

pibedindra marutsakhā sutaṃ somaṃ diviṣṭiṣu |
vajraṃ śiśāna ojasā

76.10

उ॒त्तिष्ठ॒न्नोज॑सा स॒ह पी॒त्वी शिप्रे॑ अवेपयः ।
सोम॑मिन्द्र च॒मू सु॒तम्

uttiṣṭhannojasā saha pītvī śipre avepayaḥ |
somamindra camū sutam

76.11

अनु॑ त्वा॒ रोद॑सी उ॒भे क्रक्ष॑माणमकृपेताम् ।
इन्द्र॒ यद्द॑स्यु॒हाभ॑वः

anu tvā rodasī ubhe krakṣamāṇamakṛpetām |
indra yaddasyuhābhavaḥ

76.12

वाच॑म॒ष्टाप॑दीम॒हं नव॑स्रक्तिमृत॒स्पृश॑म् ।
इन्द्रा॒त्परि॑ त॒न्वं॑ ममे

vācamaṣṭāpadīmahaṃ navasraktimṛtaspṛśam |
indrātpari tanvaṃ mame

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