अष्टम मण्डल

सूक्त 77: नवजात इन्द्र माता से पूछते हैं

ऋषि: कुरुसुतिः काण्वः · देवता: इन्द्रः · छन्द: गायत्री, १०-११ प्रगाथः ( बृहती, सतोबृहती )

11 श्लोक · 77 में से 103

इस अध्याय में क्या होता है

नवजात इन्द्र माता से पूछते हैं

कुरुसुति काण्व इन्द्र के जन्म की कथा कहते हैं। जन्म लेते ही शतक्रतु माता से पूछते हैं, कौन उग्र हैं, कौन प्रसिद्ध हैं? शवसी और्णवाभ और अहीशुव का नाम लेकर कहती हैं, पुत्र, वे गिरा दिए जाएँ। इन्द्र ने उन्हें हथौड़े से ठोंके अरों की तरह कुचल डाला और दस्युओं के संहारक बने। एक ही घूँट में उन्होंने सोम के तीस सरोवर पी लिए। अथाह लोकों में उन्होंने गन्धर्व को बेधा। उनके बाण के सौ फलक और सहस्र पंख हैं। उनसे प्रेरित उरुक्रम विष्णु सौ भैंसे, दूध में पका ओदन और एमुष वराह ले आए। उनका धनुष और स्वर्ण बाण सुगठित हैं।

77.1

ज॒ज्ञा॒नो नु श॒तक्र॑तु॒र्वि पृ॑च्छ॒दिति॑ मा॒तर॑म् ।
क उ॒ग्राः के ह॑ शृण्विरे

jajñāno nu śatakraturvi pṛcchaditi mātaram |
ka ugrāḥ ke ha śṛṇvire

77.2

आदीं॑ शव॒स्य॑ब्रवीदौर्णवा॒भम॑ही॒शुव॑म् ।
ते पु॑त्र सन्तु नि॒ष्टुर॑ः

ādīṃ śavasyabravīdaurṇavābhamahīśuvam |
te putra santu niṣṭuraḥ

77.3

समित्तान्वृ॑त्र॒हाखि॑द॒त्खे अ॒राँ इ॑व॒ खेद॑या ।
प्रवृ॑द्धो दस्यु॒हाभ॑वत्

samittānvṛtrahākhidatkhe arām̐ iva khedayā |
pravṛddho dasyuhābhavat

77.4

एक॑या प्रति॒धापि॑बत्सा॒कं सरां॑सि त्रिं॒शत॑म् ।
इन्द्र॒ः सोम॑स्य काणु॒का

ekayā pratidhāpibatsākaṃ sarāṃsi triṃśatam |
indraḥ somasya kāṇukā

77.5

अ॒भि ग॑न्ध॒र्वम॑तृणदबु॒ध्नेषु॒ रज॒स्स्वा ।
इन्द्रो॑ ब्र॒ह्मभ्य॒ इद्वृ॒धे

abhi gandharvamatṛṇadabudhneṣu rajassvā |
indro brahmabhya idvṛdhe

77.6

निरा॑विध्यद्गि॒रिभ्य॒ आ धा॒रय॑त्प॒क्वमो॑द॒नम् ।
इन्द्रो॑ बु॒न्दं स्वा॑ततम्

nirāvidhyadgiribhya ā dhārayatpakvamodanam |
indro bundaṃ svātatam

77.7

श॒तब्र॑ध्न॒ इषु॒स्तव॑ स॒हस्र॑पर्ण॒ एक॒ इत् ।
यमि॑न्द्र चकृ॒षे युज॑म्

śatabradhna iṣustava sahasraparṇa eka it |
yamindra cakṛṣe yujam

77.8

तेन॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र॒ नृभ्यो॒ नारि॑भ्यो॒ अत्त॑वे ।
स॒द्यो जा॒त ऋ॑भुष्ठिर

tena stotṛbhya ā bhara nṛbhyo nāribhyo attave |
sadyo jāta ṛbhuṣṭhira

77.9

ए॒ता च्यौ॒त्नानि॑ ते कृ॒ता वर्षि॑ष्ठानि॒ परी॑णसा ।
हृ॒दा वी॒ड्व॑धारयः

etā cyautnāni te kṛtā varṣiṣṭhāni parīṇasā |
hṛdā vīḍvadhārayaḥ

77.10

विश्वेत्ता विष्णु॒राभ॑रदुरुक्र॒मस्त्वेषि॑तः ।
श॒तं म॑हि॒षान्क्षी॑रपा॒कमो॑द॒नं व॑रा॒हमिन्द्र॑ एमु॒षम्

viśvettā viṣṇurābharadurukramastveṣitaḥ |
śataṃ mahiṣānkṣīrapākamodanaṃ varāhamindra emuṣam

77.11

तु॒वि॒क्षं ते॒ सुकृ॑तं सू॒मयं॒ धनु॑ः सा॒धुर्बु॒न्दो हि॑र॒ण्यय॑ः ।
उ॒भा ते॑ बा॒हू रण्या॒ सुसं॑स्कृत ऋदू॒पे चि॑दृदू॒वृधा॑

tuvikṣaṃ te sukṛtaṃ sūmayaṃ dhanuḥ sādhurbundo hiraṇyayaḥ |
ubhā te bāhū raṇyā susaṃskṛta ṛdūpe cidṛdūvṛdhā

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)