पञ्चम मण्डल

सूक्त 10: बिजली-सी दौड़ती ज्वालाएँ

ऋषि: गय आत्रेयः · देवता: अग्निः · छन्द: अनुष्टुप्, ४, ७ पङ्क्तिः

7 श्लोक · 10 में से 87

इस अध्याय में क्या होता है

बिजली-सी दौड़ती ज्वालाएँ

आत्रेय गय फिर अनुष्टुप् और पंक्ति में अग्निदेव से सबसे प्रबल तेज और बल का मार्ग माँगते हैं। अग्नि अद्भुत हैं, असुर्य बल उनमें आरूढ़ हुआ है; वे मित्र के समान पूज्य हैं। ऋषि प्रार्थना करते हैं कि जो दानी स्तोत्रों से अग्नि को सजाते हैं और जिनकी कीर्ति आकाश तक जागती है, उनके घर और धन बढ़ें। उनकी दीप्त ज्वालाएँ निर्भय होकर निकलती हैं, बिजली की तरह चारों ओर घूमती हैं, विजय चाहते रथ की तरह गर्जती हैं। अंगिरा और होता कहकर स्तुत अग्नि से विजयी धन लाने और युद्ध में अपने लोगों के साथ खड़े होने की विनती है।

10.1

अग्न॒ ओजि॑ष्ठ॒मा भ॑र द्यु॒म्नम॒स्मभ्य॑मध्रिगो ।
प्र नो॑ रा॒या परी॑णसा॒ रत्सि॒ वाजा॑य॒ पन्था॑म्

agna ojiṣṭhamā bhara dyumnamasmabhyamadhrigo |
pra no rāyā parīṇasā ratsi vājāya panthām

10.2

त्वं नो॑ अग्ने अद्भुत॒ क्रत्वा॒ दक्ष॑स्य मं॒हना॑ ।
त्वे अ॑सु॒र्य१॒॑मारु॑हत्क्रा॒णा मि॒त्रो न य॒ज्ञिय॑ः

tvaṃ no agne adbhuta kratvā dakṣasya maṃhanā |
tve asuryamāruhatkrāṇā mitro na yajñiyaḥ

10.3

त्वं नो॑ अग्न एषां॒ गयं॑ पु॒ष्टिं च॑ वर्धय ।
ये स्तोमे॑भि॒ः प्र सू॒रयो॒ नरो॑ म॒घान्या॑न॒शुः

tvaṃ no agna eṣāṃ gayaṃ puṣṭiṃ ca vardhaya |
ye stomebhiḥ pra sūrayo naro maghānyānaśuḥ

10.4

ये अ॑ग्ने चन्द्र ते॒ गिर॑ः शु॒म्भन्त्यश्व॑राधसः ।
शुष्मे॑भिः शु॒ष्मिणो॒ नरो॑ दि॒वश्चि॒द्येषां॑ बृ॒हत्सु॑की॒र्तिर्बोध॑ति॒ त्मना॑

ye agne candra te giraḥ śumbhantyaśvarādhasaḥ |
śuṣmebhiḥ śuṣmiṇo naro divaścidyeṣāṃ bṛhatsukīrtirbodhati tmanā

10.5

तव॒ त्ये अ॑ग्ने अ॒र्चयो॒ भ्राज॑न्तो यन्ति धृष्णु॒या ।
परि॑ज्मानो॒ न वि॒द्युत॑ः स्वा॒नो रथो॒ न वा॑ज॒युः

tava tye agne arcayo bhrājanto yanti dhṛṣṇuyā |
parijmāno na vidyutaḥ svāno ratho na vājayuḥ

10.6

नू नो॑ अग्न ऊ॒तये॑ स॒बाध॑सश्च रा॒तये॑ ।
अ॒स्माका॑सश्च सू॒रयो॒ विश्वा॒ आशा॑स्तरी॒षणि॑

nū no agna ūtaye sabādhasaśca rātaye |
asmākāsaśca sūrayo viśvā āśāstarīṣaṇi

10.7

त्वं नो॑ अग्ने अङ्गिरः स्तु॒तः स्तवा॑न॒ आ भ॑र ।
होत॑र्विभ्वा॒सहं॑ र॒यिं स्तो॒तृभ्य॒ः स्तव॑से च न उ॒तैधि॑ पृ॒त्सु नो॑ वृ॒धे

tvaṃ no agne aṅgiraḥ stutaḥ stavāna ā bhara |
hotarvibhvāsahaṃ rayiṃ stotṛbhyaḥ stavase ca na utaidhi pṛtsu no vṛdhe

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