इस अध्याय में क्या होता है जन के जागरूक रक्षक आत्रेय सुतंभर जगती छन्द में अग्निदेव की स्तुति करते हैं। प्रजा के रक्षक, सदा जागरूक, नए कल्याण के लिए जन्मे हैं; घी से मुख वाले वे भरतों के लिए आकाश छूती ज्योति से चमकते हैं। मनुष्य उन्हें तीनों स्थानों में यज्ञ की पताका और प्रथम पुरोहित मानकर प्रज्वलित करते हैं, और वे इन्द्र तथा देवों के साथ कुश पर बैठते हैं। उनका धुआँ आकाश में ध्वजा बन जाता है। गायक यह सबसे मधुर वचन अग्नि के हृदय को अर्पित करता है। अन्तिम मन्त्र स्मरण करता है कि अंगिरसों ने उन्हें हर वृक्ष में छिपा पाया, और मन्थन से बलपूर्वक जन्मे वे सहस् के पुत्र कहलाते हैं।
11.1 जन॑स्य गो॒पा अ॑जनिष्ट॒ जागृ॑विर॒ग्निः सु॒दक्ष॑ः सुवि॒ताय॒ नव्य॑से । घृ॒तप्र॑तीको बृह॒ता दि॑वि॒स्पृशा॑ द्यु॒मद्वि भा॑ति भर॒तेभ्य॒ः शुचि॑ः
janasya gopā ajaniṣṭa jāgṛviragniḥ sudakṣaḥ suvitāya navyase | ghṛtapratīko bṛhatā divispṛśā dyumadvi bhāti bharatebhyaḥ śuciḥ
11.2 य॒ज्ञस्य॑ के॒तुं प्र॑थ॒मं पु॒रोहि॑तम॒ग्निं नर॑स्त्रिषध॒स्थे समी॑धिरे । इन्द्रे॑ण दे॒वैः स॒रथं॒ स ब॒र्हिषि॒ सीद॒न्नि होता॑ य॒जथा॑य सु॒क्रतु॑ः
yajñasya ketuṃ prathamaṃ purohitamagniṃ narastriṣadhasthe samīdhire | indreṇa devaiḥ sarathaṃ sa barhiṣi sīdanni hotā yajathāya sukratuḥ
11.3 अस॑म्मृष्टो जायसे मा॒त्रोः शुचि॑र्म॒न्द्रः क॒विरुद॑तिष्ठो वि॒वस्व॑तः । घृ॒तेन॑ त्वावर्धयन्नग्न आहुत धू॒मस्ते॑ के॒तुर॑भवद्दि॒वि श्रि॒तः
asammṛṣṭo jāyase mātroḥ śucirmandraḥ kavirudatiṣṭho vivasvataḥ | ghṛtena tvāvardhayannagna āhuta dhūmaste keturabhavaddivi śritaḥ
11.4 अ॒ग्निर्नो॑ य॒ज्ञमुप॑ वेतु साधु॒याग्निं नरो॒ वि भ॑रन्ते गृ॒हेगृ॑हे । अ॒ग्निर्दू॒तो अ॑भवद्धव्य॒वाह॑नो॒ऽग्निं वृ॑णा॒ना वृ॑णते क॒विक्र॑तुम्
agnirno yajñamupa vetu sādhuyāgniṃ naro vi bharante gṛhegṛhe | agnirdūto abhavaddhavyavāhano'gniṃ vṛṇānā vṛṇate kavikratum
11.5 तुभ्ये॒दम॑ग्ने॒ मधु॑मत्तमं॒ वच॒स्तुभ्यं॑ मनी॒षा इ॒यम॑स्तु॒ शं हृ॒दे । त्वां गिर॒ः सिन्धु॑मिवा॒वनी॑र्म॒हीरा पृ॑णन्ति॒ शव॑सा व॒र्धय॑न्ति च
tubhyedamagne madhumattamaṃ vacastubhyaṃ manīṣā iyamastu śaṃ hṛde | tvāṃ giraḥ sindhumivāvanīrmahīrā pṛṇanti śavasā vardhayanti ca
11.6 त्वाम॑ग्ने॒ अङ्गि॑रसो॒ गुहा॑ हि॒तमन्व॑विन्दञ्छिश्रिया॒णं वने॑वने । स जा॑यसे म॒थ्यमा॑न॒ः सहो॑ म॒हत्त्वामा॑हु॒ः सह॑सस्पु॒त्रम॑ङ्गिरः
tvāmagne aṅgiraso guhā hitamanvavindañchiśriyāṇaṃ vanevane | sa jāyase mathyamānaḥ saho mahattvāmāhuḥ sahasasputramaṅgiraḥ
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