वा॒ज॒यन्नि॑व॒ नू रथा॒न्योगाँ॑ अ॒ग्नेरुप॑ स्तुहि ।
य॒शस्त॑मस्य मी॒ळ्हुष॑ः
vājayanniva nū rathānyogām̐ agnerupa stuhi |
yaśastamasya mīḻhuṣaḥ
ऋषि: गृत्समद (आङ्गिरसः शौनहोत्रः पश्चाद्) भार्गवः शौनकः · देवता: अग्निः · छन्द: गायत्री, ६ अनुष्टुप्
6 श्लोक · 8 में से 43
गृत्समद गायत्री छन्द में स्तोता से कहते हैं, जैसे पुरस्कार चाहने वाला रथ जोतता है, वैसे ही अग्नि की स्तुति करो। परम यशस्वी और उदार अग्नि दानी के अच्छे मार्गदर्शक हैं और कृपण को क्षीण करते हैं। साँझ और सवेरे घरों में उनकी स्तुति होती है और उनका व्रत कभी नहीं टूटता। वे अजर किरणों से सजे सूर्य के समान चमकते हैं। अत्रि की भाँति स्तुतियों ने अग्नि को उनके स्वराज्य तक बढ़ाया है, और वे सारी श्री धारण करते हैं। अनुष्टुप् में अन्तिम मन्त्र प्रार्थना करता है कि अग्नि, इन्द्र, सोम और सब देवों की रक्षा में हम सुरक्षित रहें और आक्रमणकारियों को जीतें।
वा॒ज॒यन्नि॑व॒ नू रथा॒न्योगाँ॑ अ॒ग्नेरुप॑ स्तुहि ।
य॒शस्त॑मस्य मी॒ळ्हुष॑ः
vājayanniva nū rathānyogām̐ agnerupa stuhi |
yaśastamasya mīḻhuṣaḥ
यः सु॑नी॒थो द॑दा॒शुषे॑ऽजु॒र्यो ज॒रय॑न्न॒रिम् ।
चारु॑प्रतीक॒ आहु॑तः
yaḥ sunītho dadāśuṣe'juryo jarayannarim |
cārupratīka āhutaḥ
य उ॑ श्रि॒या दमे॒ष्वा दो॒षोषसि॑ प्रश॒स्यते॑ ।
यस्य॑ व्र॒तं न मीय॑ते
ya u śriyā dameṣvā doṣoṣasi praśasyate |
yasya vrataṃ na mīyate
आ यः स्व१॒॑र्ण भा॒नुना॑ चि॒त्रो वि॒भात्य॒र्चिषा॑ ।
अ॒ञ्जा॒नो अ॒जरै॑र॒भि
ā yaḥ svarṇa bhānunā citro vibhātyarciṣā |
añjāno ajarairabhi
अत्रि॒मनु॑ स्व॒राज्य॑म॒ग्निमु॒क्थानि॑ वावृधुः ।
विश्वा॒ अधि॒ श्रियो॑ दधे
atrimanu svarājyamagnimukthāni vāvṛdhuḥ |
viśvā adhi śriyo dadhe
अ॒ग्नेरिन्द्र॑स्य॒ सोम॑स्य दे॒वाना॑मू॒तिभि॑र्व॒यम् ।
अरि॑ष्यन्तः सचेमह्य॒भि ष्या॑म पृतन्य॒तः
agnerindrasya somasya devānāmūtibhirvayam |
ariṣyantaḥ sacemahyabhi ṣyāma pṛtanyataḥ
पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)