द्वितीय मण्डल

सूक्त 7: भारत अग्नि, द्वेष से पार ले चलो

ऋषि: सोमाहुतिर्भार्गवः · देवता: अग्निः · छन्द: गायत्री

6 श्लोक · 7 में से 43

इस अध्याय में क्या होता है

भारत अग्नि, द्वेष से पार ले चलो

सोमाहुति भार्गव अग्नि को "भारत" कहते हैं, भरतों की अग्नि, युवा और कल्याणकारी। छह गायत्री मन्त्रों में वे वह श्रेष्ठ और तेजस्वी धन माँगते हैं जिसे बहुत लोग चाहते हैं। किसी देव या मनुष्य का द्वेष हम पर शासन न करे; हमें शत्रुता से पार ले चलो। जैसे जल की धाराएँ पार की जाती हैं, वैसे ही अग्नि के सहारे हम सब द्वेषों को पार करें। पवित्र और पवित्र करने वाले अग्नि घृत की आहुति पाकर ऊँचे चमकते हैं। अन्त में अग्नि को प्राचीन होता और बल का अद्भुत पुत्र कहा गया है, जिनका भोजन काठ और पेय घृत है।

7.1

श्रेष्ठं॑ यविष्ठ भार॒ताग्ने॑ द्यु॒मन्त॒मा भ॑र ।
वसो॑ पुरु॒स्पृहं॑ र॒यिम्

śreṣṭhaṃ yaviṣṭha bhāratāgne dyumantamā bhara |
vaso puruspṛhaṃ rayim

7.2

मा नो॒ अरा॑तिरीशत दे॒वस्य॒ मर्त्य॑स्य च ।
पर्षि॒ तस्या॑ उ॒त द्वि॒षः

mā no arātirīśata devasya martyasya ca |
parṣi tasyā uta dviṣaḥ

7.3

विश्वा॑ उ॒त त्वया॑ व॒यं धारा॑ उद॒न्या॑ इव ।
अति॑ गाहेमहि॒ द्विष॑ः

viśvā uta tvayā vayaṃ dhārā udanyā iva |
ati gāhemahi dviṣaḥ

7.4

शुचि॑ः पावक॒ वन्द्योऽग्ने॑ बृ॒हद्वि रो॑चसे ।
त्वं घृ॒तेभि॒राहु॑तः

śuciḥ pāvaka vandyo'gne bṛhadvi rocase |
tvaṃ ghṛtebhirāhutaḥ

7.5

त्वं नो॑ असि भार॒ताग्ने॑ व॒शाभि॑रु॒क्षभि॑ः ।
अ॒ष्टाप॑दीभि॒राहु॑तः

tvaṃ no asi bhāratāgne vaśābhirukṣabhiḥ |
aṣṭāpadībhirāhutaḥ

7.6

द्र्व॑न्नः स॒र्पिरा॑सुतिः प्र॒त्नो होता॒ वरे॑ण्यः ।
सह॑सस्पु॒त्रो अद्भु॑तः

drvannaḥ sarpirāsutiḥ pratno hotā vareṇyaḥ |
sahasasputro adbhutaḥ

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)