द्वितीय मण्डल

सूक्त 40: सोम और पूषा, अमृत की नाभि

ऋषि: गृत्समद (आङ्गिरसः शौनहोत्रः पश्चाद्) भार्गवः शौनकः · देवता: सोमापूषणौ, ६ (अन्त्यार्धर्चस्य) अदितिः · छन्द: त्रिष्टुप्

6 श्लोक · 40 में से 43

इस अध्याय में क्या होता है

सोम और पूषा, अमृत की नाभि

गृत्समद त्रिष्टुप् छन्द में सोम और पूषा को साथ सम्बोधित करते हैं। वे धन के, द्युलोक के और पृथ्वी के जनक हैं; सारे जगत के रक्षक बनकर जन्मे, और देवों ने उन्हें अमृत की नाभि बनाया। उनके जन्म पर देव प्रसन्न होते हैं। उन्हीं के द्वारा इन्द्र ने कच्ची गौओं में पका दूध रखा। वे लोक को नापने वाला सात पहियों का रथ हाँकते हैं, जो मन से जुड़ता है और जिसकी पाँच रश्मियाँ हैं। एक ने द्युलोक में ऊँचा आसन बनाया, दूसरे ने पृथ्वी और अन्तरिक्ष में। एक ने सब भुवन रचे, दूसरा सबको देखता चलता है। अन्तिम अर्धर्चा देवी अदिति को पुकारता है।

40.1

सोमा॑पूषणा॒ जन॑ना रयी॒णां जन॑ना दि॒वो जन॑ना पृथि॒व्याः ।
जा॒तौ विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य गो॒पौ दे॒वा अ॑कृण्वन्न॒मृत॑स्य॒ नाभि॑म्

somāpūṣaṇā jananā rayīṇāṃ jananā divo jananā pṛthivyāḥ |
jātau viśvasya bhuvanasya gopau devā akṛṇvannamṛtasya nābhim

40.2

इ॒मौ दे॒वौ जाय॑मानौ जुषन्ते॒मौ तमां॑सि गूहता॒मजु॑ष्टा ।
आ॒भ्यामिन्द्र॑ः प॒क्वमा॒मास्व॒न्तः सो॑मापू॒षभ्यां॑ जनदु॒स्रिया॑सु

imau devau jāyamānau juṣantemau tamāṃsi gūhatāmajuṣṭā |
ābhyāmindraḥ pakvamāmāsvantaḥ somāpūṣabhyāṃ janadusriyāsu

40.3

सोमा॑पूषणा॒ रज॑सो वि॒मानं॑ स॒प्तच॑क्रं॒ रथ॒मवि॑श्वमिन्वम् ।
वि॒षू॒वृतं॒ मन॑सा यु॒ज्यमा॑नं॒ तं जि॑न्वथो वृषणा॒ पञ्च॑रश्मिम्

somāpūṣaṇā rajaso vimānaṃ saptacakraṃ rathamaviśvaminvam |
viṣūvṛtaṃ manasā yujyamānaṃ taṃ jinvatho vṛṣaṇā pañcaraśmim

40.4

दि॒व्य१॒॑न्यः सद॑नं च॒क्र उ॒च्चा पृ॑थि॒व्याम॒न्यो अध्य॒न्तरि॑क्षे ।
ताव॒स्मभ्यं॑ पुरु॒वारं॑ पुरु॒क्षुं रा॒यस्पोषं॒ वि ष्य॑तां॒ नाभि॑म॒स्मे

divyanyaḥ sadanaṃ cakra uccā pṛthivyāmanyo adhyantarikṣe |
tāvasmabhyaṃ puruvāraṃ purukṣuṃ rāyaspoṣaṃ vi ṣyatāṃ nābhimasme

40.5

विश्वा॑न्य॒न्यो भुव॑ना ज॒जान॒ विश्व॑म॒न्यो अ॑भि॒चक्षा॑ण एति ।
सोमा॑पूषणा॒वव॑तं॒ धियं॑ मे यु॒वाभ्यां॒ विश्वा॒ः पृत॑ना जयेम

viśvānyanyo bhuvanā jajāna viśvamanyo abhicakṣāṇa eti |
somāpūṣaṇāvavataṃ dhiyaṃ me yuvābhyāṃ viśvāḥ pṛtanā jayema

40.6

धियं॑ पू॒षा जि॑न्वतु विश्वमि॒न्वो र॒यिं सोमो॑ रयि॒पति॑र्दधातु ।
अव॑तु दे॒व्यदि॑तिरन॒र्वा बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीरा॑ः

dhiyaṃ pūṣā jinvatu viśvaminvo rayiṃ somo rayipatirdadhātu |
avatu devyaditiranarvā bṛhadvadema vidathe suvīrāḥ

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)